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Wednesday, July 15, 2020

क्या इस्लामी नियम मानने के कारण हिंदू एक तरह के मुस्लिम बन चुके हैं?

समा चुका है इस्लाम हिंदुओं के दैनिक जीवन में
मैं इस्लाम की मज़ाक़ उड़ाने वाले आर्य समाजियों और हिंदुत्ववादियों को हमेशा एक छिपे हुए मिश्रित मुस्लिम के रूप में देखता हूँ।
ये पगलैट और हठधर्म होने का दिखावा करते हैं वर्ना हक़ीक़त यह है कि ये लोग चुपके चुपके इस्लामी सभ्यता और रहन सहन सीखते हैं और इस्लाम को उसका क्रेडिट नहीं देते कि अब हम वर्ण व्यवस्था पर नहीं बल्कि इस्लाम पर चलते हैं।
आप देख सकते हैं, अब ये लोग छूतछात नहीं मानते। कोविड19 से बचाव के लिए सरकार सोशल डिस्टेंस को कह रही है कि एक दूसरे से दूर रहो लेकिन
ये लोग मुस्लिमों की तरह सब एक दूसरे को छू रहे हैं। जिसके कारण हिंदू भाईयों से जुर्माने के रूप में करोड़ों रूपया वसूला जा चुका है।मुस्लिमों के आने से पहले भारतीय हिंदू जातियों की यह हालत न थी।
अब ये अपना घर यानी अपना वर्ण धर्म छोड़कर इस्लाम में शरण लिए हुए हैं।
इस्लामम् शरणम् गच्छामि।

इस सामाजिक सत्य को सब पहचानें।
मैं हिंदू भाईयों से यह नहीं कहता कि आप इस्लाम क़ुबूल कर लें क्योंकि यह काम काफ़ी कुछ वे पहले ही कर चुके हैं।
जिस पर मैं उन्हें बस मुबारकबाद देता हूँ कि
मुबारक हो, अब आप इस्लामी नियम मानने के कारण एक तरह के मुस्लिम हैं, अल्हम्दुलिल्लाह!
क्या आप मेरे नज़रिए से भारतीय समाज को देख सकते हैं?
इमेज नीचे अवेलेबल है:

Monday, July 13, 2020

क्या वैदिक धर्मी तुर्की को शर्मिन्दा करने के लिए जैनियों के क़ब्ज़ाए हुए मंदिर लौटा सकते हैं?


क्या अब वैदिक धर्मी जैनियों के क़ब्ज़ाए हुए मंदिर लौटा देंगे?
तुर्की देश में हाजिया सफ़िया म्यूज़ियम को मस्जिद बनाने का विरोध करने वाले भारतीय वैदिक और आर्य समाजी भाईयों से मुझमें अचानक यह आशा जागी है कि चाहे तुर्की के लोग न्याय न करें परन्तु वैदिक धर्म प्रचारक अवश्य न्याय करेंगे और जैनियों के क़ब्ज़ाए हुए मंदिर जैनियों को वापस कर देंगे या कम से कम उन्हें वापस करने के लिए लेख अवश्य लिखेंगे। स्वामी दयानन्द जी स्वीकार करते हैं:
'शंकराचार्य्य के सर्वत्र आर्यावर्त्त देश में घूमने का प्रबन्ध सुधन्वादि राजाओं ने कर दिया और उन की रक्षा के लिये साथ में नौकर चाकर भी रख दिये। उसी समय से सब के यज्ञोपवीत होने लगे और वेदों का पठन-पाठन भी चला। दस वर्ष के भीतर सर्वत्र आर्यावर्त्त देश में घूम कर जैनियों का खण्डन और वेदों का मण्डन किया। परन्तु शंकराचार्य्य के समय में जैन विध्वंस अर्थात् जितनी मूर्त्तियां जैनियों की निकलती हैं। वे शंकराचार्य्य के समय में टूटी थीं और जो विना टूटी निकलती हैं वे जैनियों ने भूमि में गाड़ दी थीं कि तोड़ी न जायें। वे अब तक कहीं भूमि में से निकलती हैं। शंकराचार्य्य के पूर्व शैवमत भी थोड़ा सा प्रचरित था; उस का भी खण्डन किया। वाममार्ग का खण्डन किया। उस समय इस देश में धन बहुत था और स्वदेशभक्ति भी थी। जैनियों के मन्दिर शंकराचार्य्य और सुधन्वा राजा ने नहीं तुड़वाये थे क्योंकि उन में वेदादि की पाठशाला करने की इच्छा थी।'

-सत्यार्थ प्रकाश, 11वाँ समुल्लास

यदि वैदिक धर्मी जैनियों के क़ब्ज़ाए हुए मंदिर लौटाने के बाद हाजिया सफ़िया मस्जिद का विरोध करें तो तुर्की लोग भी न्याय करने पर मजबूर हो जाएंगे वर्ना वे भी भारतीय इतिहास पढ़कर हिंदुत्ववादियों को न्याय करने के लिए कहेंगे।
हमें वैदिक धर्म और हिन्दुत्व का सिर शर्मिंदगी से झुकने से बचाना होगा और क़ब्जाए हुए जैन मंदिर जैनियों को सादर लौटाने होंगे।

आपकी सुविधा के लिए नीचे इमेज भी अवेलेबल है:

Thursday, July 9, 2020

किस बात से आर्य समाजी की बोलती बंद हो जाती है?

आप किसी बहस करने वाले आर्य समाजी को ग़मज़दा और डिप्रेस्ड करना चाहते हैं तो आप उससे केवल यह कह दें कि अगर आप दुनिया के सब धर्मों को ग़लत और वैदिक धर्म को सत्य मानते हैं तो आप वैदिक धर्म के चार वर्ण, चार आश्रम और विवाह व गर्भाधान आदि सोलह संस्कारों का पालन ठीक वैसे ही करें जैसे कि स्वामी दयानंद जी सिखाकर गए हैं। आप उनके उपदेश के अनुसार सुबह और शाम दोनों टाईम हवन किया करें।
यह सुनते ही आर्य समाजी फ़ौरन ग़मज़दा और डिप्रेस्ड हो जाएगा क्योंकि वह वैदिक धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था और उसके सोलह संस्कारों का पालन नहीं कर सकता।
वह बस दूसरे धर्म वालों से बहस कर सकता है कि दूसरों के धर्म ग़लत हैं लेकिन ख़ुद अपने धर्म के बुनियादी अनिवार्य नियमों पर नहीं चल सकता, जिन्हें वह सत्य मानता है।
वह आपसे अपने धर्म के इस दोष या गुण को छिपाता है कि वैदिक धर्म के नियमों का पालन असम्भव है। ब्रह्मचर्य आश्रम असम्भव है।
इसलिए जब एक आर्य समाजी आपसे बहस करे तो आप उसे उसके धर्म के अनुसार कर्म करने के लिए कहें। वह इसके लिए कभी तैयार नहीं होगा और इस तरह आप उसे यह रियलाईज़ करा देंगे कि वह एक ऐसे धर्म की ओर से बहस कर रहा है कि अगर वह उसे सत्य सिद्ध भी कर दे, तब भी वह उस पर चल नहीं सकता और परमेश्वर का धर्म ऐसा कभी नहीं हो सकता कि जो उसे सत्य माने, वह उस पर चल न सके।
इसलिए सभी धर्मों के नेक लोगों को मेरी यह सलाह है कि आर्य समाजियों से बेकार बहस न करें। उनसे कहें कि आप अपने धर्म पर चलकर दिखाओ। यह काम वह न कर पाएगा और फिर वह आपसे बेकार बहस भी न करेगा।
हाँ, वह अपनी पोल खुलने पर ग़ुस्से में आकर गाली गलौच कर सकता है या फिर अपनी ख़राब आदत के मुताबिक़ आपके धर्म की मज़ाक़ उड़ा सकता। जिसके लिए आर्य समाजी पहचाने जाते हैं लेकिन वह अपने धर्म पर नहीं चल सकता क्योंकि अधिकतर आर्य समाजियों के लिए वैदिक धर्म पर चलना सम्भव नहीं है।
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Tuesday, July 7, 2020

DR. ANWER JAMAL से उत्तर की आशा रखने वाले आर्य समाजी प्रश्नकर्ता में कौन कौन सी योग्यता होना आवश्यक है?

हमसे उत्तर लेने के लिए किसी आर्य समाजी लेखक में तीन बातें होनी आवश्यक हैं।
पहला ज्ञान, दूसरी हैसियत और तीसरी सभ्यता।

1. यदि वह हमारे पहले से लम्बित प्रश्नों के उत्तर दे देता है जो कि 'स्वामी दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया?' नामक पुस्तक में उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो हम जान लेंगे कि यह ज्ञान रखता है।
हमारे प्रश्नों का उत्तर दे दो और हमसे उत्तर ले लो। यह पुस्तक इंटरनेट पर मुफ़्त अवेलेबल है-

2. दूसरी बात यह है कि जो आदमी हमसे प्रश्न करे वह हमारे बराबर की हैसियत का हो यानि जैसे मैं अपने दीन के अनिवार्य नियमों का पालन करता हूं वैसे ही वह आर्य समाज के अनुसार वैदिक धर्म के अनिवार्य संस्कारों का पालन करता हो,
उनके विपरीत न चलता हो।

जो हमारे बराबर की हैसियत का हो,
वही हमसे प्रश्न करने का अधिकारी है।
जब ऐसा व्यक्ति प्रश्न करेगा,
हम उसे उत्तर देंगे।

जो दो समय हवन न करता हो, जो वैदिक गर्भाधान संस्कार के बजाय इस्लामी संस्कार से पैदा हुआ हो,
वह तो पहले ही आर्य समाज/वैदिक धर्म से बाहर है। उसे हमसे प्रश्न का अधिकार ही नहीं है और
अधिकतर आर्य समाजी ऐसे ही पतित और भ्रष्ट हैं।
स्वामी दयानंद जी ने चतुर्थ समुल्लास में ऐसे लोगों को बाहर निकालने की व्यवस्था दी है।
¤ हवन न करने वाले शूद्र्वत् हैं
स्वामी जी कहते हैं कि
‘इसलिए दिन और रात्रि के सन्धि में अर्थात् सूर्योदय और अस्त समय में परमेश्वर का ध्यान और अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए।।3।। और जो ये दोनों काम सायं और प्रातःकाल में न करे उसको सज्जन लोग सब द्विजों के कर्मों से बाहर निकाल देवें अर्थात् उसे शूद्रवत् समझें।।4।।
(सत्यार्थ प्रकाश, चतुर्थसमुल्लास, पृष्ठ सं. 65)


3. तीसरी बात, उसमें सभ्यता होनी चाहिए। वह असंसदीय भाषा का इस्तेमाल न करता हो, वह गालियाँ न बकता हो। उसे सम्मानित लोगों से यानि हमसे बात करने की तमीज़ होनी ज़रूरी है। बदतमीज़ आदमियों से समाज के सम्मानित लोग बात नहीं करते।

Monday, July 6, 2020

आर्य समाजी दूसरे धर्मों के महापुरुषों की मज़ाक़ क्यों उड़ाते हैं?

कारण
क्योंकि वास्तव में दूसरे धर्मों की मज़ाक़ उड़ाने वाले आर्य समाजी मूर्ख अर्थात् शूद्र होते हैं। वे अपने वैदिक धर्म पर चल नहीं सकते। वे दो टाईम डेली हवन तक नहीं करते। इसीलिए वे सदा कुंठित और निराश रहते हैं।
जब जब मैंने सोचा कि आर्य समाजी दूसरे धर्म के महापुरुषों की मज़ाक़ क्यों उड़ाते हैं और वे धर्म चर्चा के बीच में दूसरों को ग़ुस्सा दिलाने के लिए गंदी गालियाँ क्यों बकते हैं?
तब तब मेरी अन्तरात्मा ने मुझसे कहा: कुंठित और निराश आर्य समाजी इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि स्वामी दयानंद जी ने उन्हें बीच में टाँग दिया है।
देखिए कैसे?
स्वामी दयानंद जी ने उन्हें चार वैदिक आश्रमों के पालन का उपदेश दिया:
1. ब्रह्मचर्य आश्रम 2. गृहस्थ आश्रम 3. वानप्रस्थ आश्रम 4. सन्यास आश्रम
आर्य समाजी दो आश्रम ब्रह्मचर्य और सन्यास नहीं करते हैं। आर्य समाजी युवाओं को उनके पिता गुरूकुल के बजाय कान्वेंट स्कूल में लड़कियों के साथ पढवाते हैं। जहाँ उनका ब्रह्मचर्य सब नष्ट हो जाता है। दयानंद एंग्लो वैदिक कालिज (DAV College) में भी लड़के लड़कियां साथ साथ पढ़ते हैं। जोकि दयानंद जी की शिक्षा के विपरीत है। 
आर्य समाजियों से वानप्रस्थ आश्रम भी नहीं होता। गृहस्थ आश्रम उनका यूं सफल नहीं है क्योंकि आर्य समाजी दयानंद जी की बताई जटिल रीति के अनुसार चार पंडितों से गर्भाधान संस्कार के मंत्र पढ़वाए बिना, उनसे और सब वृद्धों से आशीर्वाद लिए बिना मुस्लिमों की तरह ही पत्नी को गर्भवती करते हैं। क्योंकि आसान और प्रैक्टिकल तरीक़ा यही है।
आर्य समाजी अपने धर्म के चार आश्रमों 1. ब्रह्मचर्य आश्रम 2. गृहस्थ आश्रम 3. वानप्रस्थ आश्रम 4. सन्यास आश्रम; पर नहीं चल पाते। जिसके कारण वे कुंठित और निराशा से हर समय खीझते और चिढ़ते रहते हैं। जब वे मुस्लिमों को ज़कात (दान) देते हुए और नमाज़ पढ़ते हुए या सिखों को अरदास करते हुए देखते हैं और दूसरे धर्म वालों को अपने धर्म पर चलते हुए देखते है तो उन्हें अपनी दुर्दशा पर बहुत क्रोध आता है। इसीलिए वे दूसरों के अच्छे कामों की सराहना नहीं करते बल्कि उन पर क्रोधित होकर उनका मज़ाक़ उड़ाते रहते हैं। ख़ुद को आर्य समाजी दिखाने के लिए उनके पास बस अब यही एक काम बचा है कि दूसरे धर्मों की और उनके महापुरुषों की मज़ाक़ उड़ाते रहें। वे यह भी न करें तो वे आर्य समाजी न दिखें।
इसकी असल वजह यही है कि न तो वे अपने वैदिक धर्म के चारों आश्रमों पर चलते हैं और न ही चल सकते हैं। अब वे न वैदिक धर्म पर चल सकते हैं और न उसे अव्यवहारिक कहकर छोड़ सकते हैं। आज आर्य समाजी बीच में टंगे हुए हैं।
वास्तव में अधिकतर आर्य समाजी 'आर्य' (श्रेष्ठ) ही नहीं होते बल्कि वे अनार्य और शूद्र अर्थात मूर्ख होते हैं क्योंकि जो लोग अपने धर्म पर न चलकर दूसरे धर्म के महापुरुषों को गालियाँ देते हैं, वे अपनी मूर्खता ही प्रर्दशित करते हैं।
हमारा चैलेंज
अगर वास्तव में वैदिक धर्म का पालन सम्भव है तो आर्य समाजी अपने चारों वैदिक आश्रमों और सोलह संस्कारों का पालन करके दिखाएं।

Friday, July 3, 2020

स्वामी दयानंद जी के लेखन को सत्य माना जाए तो क्या नए स्मारक नई आय का साधन बन सकते हैं?

स्वामी दयानंद जी की प्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश भारत की आर्थिक स्थिति सुधारने में बहुत बड़ी सहायता कर सकती है।
आप सब जानते हैं कि पश्चिमी देशों के लोग प्रेम और सैक्स की घटनाओं के स्मारकों को देखने के लिए टूर करते हैं। जैसे कि वे ताजमहल और अजन्ता व ऐलोरा देखने आते हैं। जिससे देश को अरबों रूपये का व्यापार और टैक्स लाभ होता है।
यदि हम ऐसे और अधिक स्मारक बनाएं तो भारत सरकार को और अधिक व्यापार व टैक्स प्राप्त होगा।

विदेशी टूरिस्टों को आकर्षित करने के लिए
हमें घोड़े के लिंग से मर चुकी और जल चुकी नारियों के प्रति विशेष आदर प्रदर्शित करने की आवश्यकता है।
ऐसी नारियों के राष्ट्रीय स्मारक बनें और उन पर डाक टिकट जारी हो।
यदि ऐसे स्मारक बनें तो पूरी दुनिया से करोड़ों लोग ऐसी वीर भारतीय नारियों के स्मारक पर नमन करने आएंगे।
जिनसे टूरिज़्म बढ़ेगा और सरकार को जीएसटी व अन्य टैक्स ताजमहल से अधिक मिल सकता है।

ऐसी एक घटना का वर्णन स्वामी दयानंद जी ने किया है:
'सुनते हैं कि एक इसी देश में गोरखपुर का राजा था। उस से पोपों ने यज्ञ कराया। उस की प्रिय राणी का समागम घोड़े के साथ कराने से उसके मर जाने पर पश्चात् वैराग्यवान् होकर अपने पुत्र को राज्य दे, साधु हो, पोपों की पोल निकालने लगा।'
-सत्यार्थ प्रकाश 11वाँ समुल्लास
ऐसी सभी बलिदानी वीर आर्य रानियों के नाम और उनके गौरवशाली इतिहास को विश्व के सामने लाना भारत की आर्थिक दशा सुधारने की दृष्टि से आवश्यक है। इससे उनका बलिदान भी सबके सामने आ सकेगा।

नए स्मारक नई आय का साधन बनेंगे।
मैं स्वामी दयानंद जी के इस रहस्योद्घाटन को राष्ट्र हित में आप जैसे विद्वानों को विचार हेतु समर्पित करता हूं।
हम सबको सांप्रदायिक संकीर्णता से ऊपर उठकर राष्ट्र हित में इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

Sunday, May 17, 2020

यदि दयानंद जी ने अपना जन्म स्थान सही सही बताया था तो वह उनके किसी चेले को मिला क्यों नहीं?

कृपया अधिक से अधिक शेयर करें
दयानंद जी ने अपना जन्म स्थान सही सही बताया था तो वह उनके किसी चेले को मिला क्यों नहीं?
आपको सारे आर्य समाजी भाई बहन सनातनी पंडितों और दूसरे धर्म के ज्ञानियों को अज्ञानी बताते हुए और उन पर हंसते हुए मिल जाएंगे।
लेकिन ख़ुद उनके ज्ञान का हाल यह है कि वे बता नहीं पाएंगे अगर आप उनसे यह पूछ लें कि जिस बस्ती में दयानंद जी पैदा हुए थे, वहाँ कोई आर्य समाज मंदिर है या नहीं?
क्योंकि दयानंद जी की मौत के बाद से पंडित लेखराम आदि उनके चेले उनका जन्म स्थान तलाशने में लगे हुए हैं लेकिन गूगल मैप और जीपीएस आने के बावुजूद वे आज तक अपने गुरू का जन्म स्थान नहीं खोज पाए।
दयानंद जी अपना सही जन्म स्थान और कुल गोत्र आदि छिपा कर चले गए। सही किया। जातिवादी भारतीय समाज में सम्मान पाने के लिए सभी समझदार लोग ऐसा करते हैं।
उनका दूसरा समझदारी भरा निर्णय उनके द्वारा अंधे व्यक्ति को गुरू बनाना था क्योंकि अंधा आदमी जाँच परख करने में अक्षम होता है।
अब आर्य समाजियों का पूरे दिन दूसरे धर्म वालों से प्रश्न करने का का काम है और ख़ुद इस प्रश्न का जवाब नहीं देते कि
यदि दयानंद जी ने अपना जन्म स्थान सही सही बताया था तो वह उनके किसी चेले को मिला क्यों नहीं?

Aapki facilitiy ke liye yh image bhi ready hai.
Ise bhi Indian Society me shanti ki niyyat se share karen.

Sunday, May 3, 2020

रोज़े का मक़सद तक़वा है और तक़वा वालों की विजय निश्चित है, अल्हम्दुलिल्लाह! -DR. ANWER JAMAL

Faiz-Asslamalaikum hazrat. Bhai gair muslim intellectual ki taraf se ques hai ki .....fast me khana chodna to theek hai lekin pani kyu chudwa diya jata hai. Vo PhD hen seculer mijaz ke. Plz jawab zrur djiyega.

DR. ANWER JAMAL- अरबी ज़ुबान (भाषा) का सौम या स्याम लफ़्ज़ ही दरअसल फ़ारसी में रोज़ा है। सौम या स्याम का संस्कृत/हिन्दी में मतलब होगा 'संयम'। इस तरह अरबी़ जबान का सौम या स्याम ही हिन्दी/संस्कृत में संयम है। इस तरह रोज़े का मतलब हुआ सौम या स्याम यानी 'संयम।' यानी रोज़ा 'संयम' और 'सब्र' सिखाता है।

रोज़े का मक़सद यह है कि इंसान बुराई से बचने की शक्ति अर्जित कर ले और वह ऐसा तब कर पाएगा जब वह अपने मन और शरीर पर क़ाबू पा ले।
आम इंसान भूख, प्यास, नींद और और सैक्स की इच्छाओं के क़ाबू में होते हैं। जब उन्हें भूख, प्यास, नींद और और सैक्स में जिस काम की ज़रूरत महसूस होती है और मन और शरीर जिस काम के लिए उत्तेजित करते हैं, इंसान उसे उनके क़ाबू में होकर अपना विवेक इस्तेमाल किए बिना कर डालता है।
ऐसे ही लालच, डर, नफ़रत, ग़म, ग़ुस्सा और शक जैसी बहुत सी नकारात्मक भावनाएं हैं, जिनके क़ाबू में एक इंसान हमेशा रहता है और वह पूरी ज़िन्दगी अपनी नफ़्सियाती ख़्वाहिशात (मन की इच्छाओं और आवेगों) को 'इलाह और हाकिम' बनाए रखता है जबकि हक़ीक़त में ये 'इलाह और हाकिम' नहीं हैं, इंसान के दास हैं।
सौम अर्थात रोज़े का मकसद यही है कि इंसान हाकिम है तो अपने दासों का दास बनकर न रहे बल्कि उनका हाकिम बने और अपने दासों से अपनी सेवा ले और इसके लिए वह सबसे पहले अपने मन और शरीर में उठने वाली ख़्वाहिशात पर क़ाबू करे। अपनी भूख, प्यास, नींद, सैक्स, लालच, डर, नफ़रत, गुस्से, शक और वसवसों पर क़ाबू पाए।
जब एक इंसान रोज़ा रखता है तो उसके शरीर में भूख, प्यास, नींद और सैक्स की क़ुदरती डिमांड पैदा होती है लेकिन वह उन्हें रोक देता है और शरीर एक दास की तरह उसके फ़ैसले के सामने समर्पण कर देता है कि ठीक है, आपको यह नहीं करना है तो मैं यह नहीं करूंगा।
ऐसे ही उसके मन में नाजायज़ लालच, डर, नफ़रत, गुस्से, शक और वसवसों की तरंगें उठती हैं लेकिन वह अपनी ज्ञानदृष्टि से देखता है कि यह ग़लत है और मैं यह न करूंगा तो वह नहीं करता और वह अपनी नकारात्मक भावनाओं से ऊपर उठकर उन्हें क़ाबू करना सीख लेता है।
अधिकतर गुनाह और जुर्म ज्ञान की कमी और नकारात्मक भावना की अधिकता के कारण होते हैं और पूरा शहर वास्तव में मनोरोगियों का जमावड़ा मात्र है, जिसमें कोई एक दूसरे से सुरक्षित नहीं है कि न जाने दूसरा आदमी किसी औरत, बच्ची या सेठ के साथ कब क्या कर दे? कोई बाहुबली किसी ग़रीब के साथ क्या कर दे?
पूरे समाज के मनोवैज्ञानिक इलाज के लिए जितने मनोचिकित्सक चाहिएं, उतने न पहले थे और न आज ही किसी देश में हैं।
उनके मनोरोगों के इलाज के लिए अल्लाह ने रमज़ान के महीने में क़ुरआन उतारा और सबके लिए रमज़ान के रोज़े शिफ़ा (आरोग्य) के लिए रख दिए। रोज़े से शारीरिक रोग भी दूर होते हैं। जिनके दूर होने के बारे में मैं इस छोटे से कमेंट में नहीं लिख सकता। यह पूरी एक बुक का सब्जेक्ट है।
मैं यहाँ सिर्फ़ यह बताऊँगा कि रोज़े का मक़सद यह है कि इंसान अपने मन, शरीर और कर्म से बुराई से बचने की आदत डाल ले। एक काम को बार बार दोहराया जाए तो उसकी आदत पड़ जाती है। आदत सब्कान्शियस माईंड का पैटर्न है। आदत पड़ने के बाद वह काम आसान हो जाता है। एक महीने तक जागरूकता के साथ रोज़े रखने से तक़वा इंसान की आदत बन जाती है। बुराई से बचने को तक़्वा और संयम कहते हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज में अच्छाई बढ़ाने के लिए तक़्वा और संयम ज़रूरी है।
सैनिकों को भी कठिन हालात के लिए तैयार करने के लिए भूख, प्यास, नींद और शारीरिक कष्ट बर्दाश्त करने की प्रैक्टिस कराई जाती है। हरेक नागरिक में भी ये गुण होना ज़रूरी है क्योंकि हर नागरिक भी अपनी जगह एक सिपाही है और उसे अपने समाज के बुरे लोगों को चुनौती देनी पड़ती है। जिसके बाद उसे कठिन हालात पेश आते हैं।  वह उनसे घबराकर बदमाशों के सामने समर्पण न करे बल्कि उन पर अपने मनोबल से विजय पा ले, रोज़े से यह बल मिलता है।
तक़्वा और विजय आपस में जुड़े हुए हैं। तक़्वा होगा तो विजय ज़रूर होगी।
दूसरों पर विजय पाने से पहले इंसान को ख़ुद पर विजय पानी होगी। इंसान पानी से पैदा हुआ है। उसे हर थोड़ी देर में पानी की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए उसे अपनी ज़रूरत पर विजय पानी है तो उसे पानी की ज़रूरत पर भी विजय पानी होगी।
'अतः धैर्य से काम लो। निस्संदेह अन्तिम परिणाम तक़्वा (संयम रखने) वालों के पक्ष में है।'
-पवित्र क़ुरआन 11:49
तक़्वा एक ऐसा गुण है, जो बहुत से ऐसे गुणों को ख़ुद डेवलप करता है। जिनसे इंसान का भला होता है। यही इंसान का मक़सद है। जब इंसान रब के हुक्म पर चलता है तो उसका भला होता है। जिससे इंसान को ख़ुशी मिलती है। इंसान को भलाई और ख़ुशी मिलती देखकर उससे रब ख़ुश होता है।
रोज़े में पानी न पीने की वजह समझनी है तो रोज़े के मक़सद और उसके असर को समझना ज़रूरी है, जो व्यक्ति, परिवार और समाज पर पड़ते हैं।
शुक्रिया।

Sunday, April 26, 2020

वेदमंत्र 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' का देवता 'आत्मा' है, परमेश्वर नहीं है। अत: यह तौहीद का प्रमाण नहीं है।

Faiz Khan-सर् मैं आपसे किताब लिखने के लिए इसलिए कह रहा था क्योंकि मैं समझता हूँ कि दोनों तरह के नैरेटिव लोगों के सामने होने चाहिए जिसको जो सही लगे क़ुबूल कर ले मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि आप सही कह रहे हैं और न आपको ग़लत कह रहा हूँ क्योंकि मैं संस्कृत नहीं जानता और न ही वेदों के बारे में कुछ जनता हूँ सिवाय कुछ मन्त्रो के अलावा जहाँ तक WORK के दाइयों की बात है तो उसमें दोनों तरह के लोग हैं। कुछ muqallid हैं तो बहुत सारी इल्मी और अख़लाक़ी शख्सियत भी है। बहुत सारे पढ़े लिखे लोग भी वर्क में शामिल हुए हैं जो लोग वर्क मैं इख़्तेलाफ़ के आदाब नहीं जानते। असल में तारिक़ सर् की फिक्र पर नहीं हैं।तारिक़ सर् को सुनने समझने से पहले मैं भी बहुत कट्टर था उनसे हुस्ने इख़्तेलाफ़ सीखने की इब्तेदा हुई बहरहाल कोई भी दावती ग्रुप लोगों से बनता है जैसे ghamidi साहब को अल्लाह ने बड़ी इल्मी और आला shaksiyaaat की टीम दी है जिसमे से कितने लोग ऐसे हैं जो खुद किसी तंज़ीम को लीड करने की सलाहियत रखते हैं इन् शा अल्लाह तारिक़  सर को भी ऐसे लोग मिलते रहेंगे इसी तरह की जमातों के साथ अल्लाह की मदद होती है ।। अल्हम्दुलिल्लाह.
Tauheed Bhai-भाई अस्सलामु अलैकुम, अनवर भाई वेद मे तौहीद नही है ये तो पता चल गया। लेकिन कुछ मंत्र जो है जैसे कि 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' और भी इस तरह के मंत्र है जिसमे बताया गया है के वो एक है उसका कोई शरीर नही है, तो भाई इन मंत्रो में किसके बारे मे बताया गया है, भाई मदद करिये जब से आप ने बताया है वेद में तौहीद नही है तो बस ये वाले मंत्र सोच सोच कर दिमाग मे अजीब हलचल मची है।
Rihan Khan-Sir isi wajah se to dr. Anwar sahab hmare ustad e mohtram se hmne request ki h ki book likhe or usme ye sare mazameen naqal kre jaise abhi hmare bhai ne puchhenge hai "na tasya partima asti" wagera mantr pr roshni dale or unki shi tashreeh kre taki hmare ilm me izafa ho or mantro ko shi samjh sake.

Dr. Anwer Jamal- आप सभी भाईयों का इतना ज़्यादा तक़ाज़़ा  है तो मैं इस सब्जेक्ट पर जरूर एक किताब लिखूंगा, इन् शा अल्लाह; और उससे आपके सामने मेरा नज़रिया आ जाएगा लेकिन उसमें कुछ वक्त लगेगा और जैसाा कि तौहीद भाई  लिखा है कि 'भाई मदद करिये जब से आप ने बताया है कि वेद में तौहीद नही है तो बस ये वाले मंत्र सोच सोच कर दिमाग में अजीब हलचल मची है।'
आप सब लोग उस हलचल से मेरी किताब आने से पहले एक खास तकनीक का इस्तेमाल करके इत्मीनान और सुकून हासिल कर सकते हैं। मैं इस तकनीक को सेकेंड ओपिनियन तकनीक कहता हूं। हम इस तकनीक का इस्तेमाल मरीज़ की सही हालत जानने के बारे में करते हैं।
आप जानते हैं कि सब लोग किसी विशेषज्ञ डॉक्टर जितना नहीं जानते। जब एक डॉक्टर किसी गर्भवती औरत के बारे में यह सलाह देता है कि गर्भवती औरत की या उसके गर्भ के शिशु की जान को खतरा है और तुरंत उसका ऑपरेशन होना जरूरी है तो सब लोग बहुत चिंतित हो जाते हैं और गर्भवती औरत के परिवार वाले मेडिकल जानकारी के अभाव में खुद अपने ज्ञान और अपने अनुभव से यह तय नहीं कर पाते कि वे डॉक्टर का कहना मान कर ऑपरेशन कराएं या न कराएं। हम सबके सामने ऐसे कई केस आ चुके हैं जिनमें डॉक्टर ने बिना ज़रूरत ही गर्भवती औरत का ऑपरेशन कर दिया जिससे वह ग़ैर ज़रूरी तौर से आर्थिक क़र्ज़ में फंस गई और उसकी सेहत भी पहले जैसी न रही। कुछ केस ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें एक आदमी पेट दर्द के लिए अस्पताल में दाखिल हुआ और डॉक्टर ने उसे ऑपरेशन की जरूरत बताकर ऑपरेशन कर दिया। कुछ महीने बाद किसी और वजह से जब उसने अपने पेट का अल्ट्रासाउंड टेस्ट कराया तो उसे पता चला कि डॉक्टर ने उसकी एक किडनी निकाल ली है। इन सब केसेज़ को देख कर अब यह होने लगा है कि जब एक डॉक्टर किसी पेशेंट को ऑपरेशन की ज़रूरत बताता है और उसके परिवार के जागरूक लोग खुद अपने ज्ञान और अनुभव की बुनियाद पर कोई फैसला नहीं कर पाते कि उस  उस डॉक्टर की सलाह के मुताबिक ऑपरेशन कराया जाए या न कराया जाए तब वे सेकंड ओपिनियन के लिए दूसरे डॉक्टर के पास जाते हैं। अगर सचमुच ऑपरेशन की जरूरत होती है तब दूसरा डॉक्टर भी मरीज़ की रिपोर्ट्स देखकर वही बात कहता है जो पहले डॉक्टर ने कही थी जब कि उसे नहीं पता होता कि पहले डॉक्टर ने क्या कहा है। दोनों जगह एक ही बात सामने आने से बात के सच होने का यक़ीन हो जाता है।
यूरोप में, अमेरिका में और अफ़्री़क़ा में बहुत लोग पवित्र क़ुरआन का अनुवाद पढ़ कर तौहीद को अपना लेते हैं हालांकि वे लोग क़ुरआन की मूल भाषा नहीं जानते। उन्हें किसी आयत के अनुवाद में शक होता है तो वे दूसरे संप्रदाय का अनुवाद देख लेते हैं और जब वे देखते हैं कि दोनों अनुवाद में एक ही सेंस है तो वे मुत्मईन हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर सऊदी अरब में इस्लामी तीर्थ और प्रचार केंद्र है, जहाँ सब मुस्लिम हज करने जाते हैं और वहाँ के आलिम हर भाषा में पवित्र क़ुरआन का ऑथेंटिक अनुवाद डिस्ट्रीब्यूट करते हैं और सऊदी अरब ईरान का विरोध करता है। ईरान के मुस्लिम आलिम भी पवित्र क़ुरआन का अनुवाद करते हैं। अब आप देख सकते हैं कि जिन आयतों में अरब के सुन्नी आलिम तौहीद बता रहे हैं, उनका आनुवाद उसके विरोधी शिया आलिम भी तौहीद वाला करते हैं। जिन आयतों में एक अल्लाह की इबादत का हुक्म है, वे उनमें आत्मा, आग या सूरज की इबादत नहीं बताते।
इसी तरह आप ईसाई धर्म के तीर्थ स्थान वेटिकन सिटी से प्रकाशित रोमन कैथोलिक संप्रदाय के बाइबल के अनुवाद को देख सकते हैं और उसे उसके विरोधी प्रोटेस्टेंट संप्रदाय के अनुवाद से मिला कर देख सकते हैं। एक संप्रदाय के अनुवाद में जिन आयतों में क्रिएटर की तौहीद का बयान है, उन आयतों में उसके विरोधी संप्रदाय के अनुवाद में भी तौहीद का बयान ही मौजूद मिलता है।
इसी तरह आप हरिद्वार जैसे हिन्दू तीर्थों और आश्रमों और शंकराचार्यों द्वारा मान्यताप्राप्त सायण का वेदभाष्य देख लें और दूसरा ओपिनियन उसका विरोध करने वाले स्वामी दयानन्द जी का वेदभाष्य देख लें। दोनों संप्रदाय जिन वेद मंत्रों में तौहीद बता दें। आप समझ लें कि वह अनुवाद ठीक है और ऐसा मिलना बहुत मुश्किल है। सनातनी जिस मंत्र के अनुवाद में एक सूर्य की इबादत बताते हैं, स्वामी दयानन्द जी उसी में एक परमेश्वर की भक्ति बता रहे हैं। जब एक शिर्क और दूसरा तौहीद बताए तो आप समझ लें कि इस मंत्र के अनुवाद में दोनों एक मत नहीं हैं, दोनों में कोई एक ग़लत अनुवाद कर रहा है।
जैसे कि तौहीद भाई ने एक वेदमंत्र 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' यजुर्वेद 32:3
के बारे में पूछा है कि वह परमेश्वर के बारे में है या नहीं? तो आप यह बात ख़ुद भी बहुत आसानी से जान सकते हैं। उसका तरीक़ा यह है कि आप सनातनी और आर्य समाजी भाष्य लेकर दोनों का अनुवाद मिला लें। आपके सामने सच्चाई आ जाएगी। वेद के विषय में एक सकारात्मक बात यह और है कि उसमें हरेक वेदमंत्र का देवता लिखा रहता है। जिससे आप यह जान सकते हैं कि इस वेदमन्त्र में किसकी बात हो रही है?
जब आप यजुर्वेद 32:3 का देवता देखते हैं तो आपको वहाँ इस मंत्र का देवता 'आत्मा' लिखा हुआ मिलेगा और इस तरह आप जान लेंगे कि यह बात आत्मा के विषय में कही जा रही है कि आत्मा की प्रतिमा नहीं है। यह बात सच है। यह मंत्र परमेश्वर के विषय में नहीं है।
मेरा मक़सद यह नहीं है कि मैं आपको कुछ बता दूँ और आप उसे मान लें। मेरा मक़सद है कि मैं आपको जागरूक कर दूँ कि आप ख़ुद चेक करके देखें कि
1. जिन वेद मंत्रों में तौहीद बताई जाती है क्या सचमुच वैदिक धर्म के दोनों संप्रदाय उसमें तौहीद बताते हैं?
2. क्या सचमुच वेद का एक सूक्त भी एक परमेश्वर की उपासना पर आधारित है?
3. आप स्वयं जागरूक बनें ताकि कोई आपको मुशरिक न बना सके। आपकी सबसे बड़ी दौलत 'तौहीद' है। इसमें कोई समझौता न करें, इसमें किसी की शख़्सियत से मरऊब न हों। आप ख़ुद चेक करें कि दावते दीन के नाम पर शिर्क का घालमेल तो नहीं चल रहा है?
अल्लाह का शुक्र है कि WORK में बहुत सारे लोग इल्म और अच्छे अख़्लाक़ वाले हैं और वे इख़्तिलाफ़ के आदाब जानते हैं। मुझे उनसे भी ख़ैर की उम्मीद है, अल्हम्दुलिल्लाह!