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Monday, June 28, 2021

नास्तिकों और आर्य समाजियों के साथ बहस में क्या कहें?

बहस में सामने वाले को हराना एक कला है। इसके लिए कमज़ोर बिंदु तलाश कर उस पर बात की जाती है। जिससे सामने वाला बहसी घबरा जाता है कि यह बात मैं पहली बार सुन रहा हूँ।

मिसाल के तौर पर जब एक नास्तिक मुझसे बहस करने आता है तो मैं उसका जायज़ा लेता हूँ और यह पाता हूँ कि मात्र बुद्धिजीवी दिखने की सनक में यह नास्तिकों जैसी बातें कर रहा है वर्ना यह आदमी भी धर्म का नियम मानता है और उस पर चलता है।

Dharm ne sikhaya h ki Apni maa aur apni beti se shadi na karo. Ye rishtey pavitra hotey hain. 

Nastik bhi dharm ke is niyam ka palan karte hain

Aur in rishton ki pavitrta mein vishvas rakhte hain. jabki nastikta rishton ki pavitrta nhi sikhati.

Nastik log nastik vichardhara ke khilaf jakar Dharm ke niyam ka palan kartey hain.

Mai is baat par in intellectuals ki tareef karta hun ki woh Nastikta par chalkar samaj ko ganda nhi kartey.

Main inhe bhi ek prakar ka vidrohi dharmik manta hun.

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वसीम भाई ने मेरा यह लेख पढ़कर मुझे कमेंट किया कि

सही कहा आपने।

मैंने यही बात एक नास्तिक को कही थी तो कहने लगा भाई बहन शादी हम धर्म के कारण नहीं बल्कि मानव व समाज के अनुभव के कारण और जेनेटिक बीमारियों से बचने के कारण नहीं करते।

मैंने कहा कल को विज्ञान की नई रिसर्च आ जाये कि ऐसा करना सेफ है तो करोगे।

कहने लगा कल की कल देखगें। ☺️😊

मैंने उन्हें जवाब दिया कि

वसीम भाई,

कई बार एक स्त्री दो बच्चों के बाद नसबंदी करा लेती है और उसके बाद वह विधवा हो जाती है। उसका मक़सद बच्चे पैदा करना नहीं होता बल्कि केवल शारीरिक और भावनात्मक संतुष्टि करना होता है। ऐसी स्त्री का बेटा या पिता या भाई नास्तिक हो तो क्या वह नास्तिक इस पीड़ित नारी के दुखों का हरण करने के लिए उससे शादी करेगा?

जिसे विज्ञान और नास्तिकता दोनों ही मानव जाति के लिए सुरक्षित बताएंगे।

यह प्रश्न अभी उपस्थित है तो इसे नास्तिक अभी देख लें। आगे देखने की ज़रूरत नहीं है।

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जब एक आदमी अचानक आपसे आपके धर्म पर बहस शुरू करता है तो वह या तो सोशल मीडिया के वायरल विचारों को बिना जाने दोहराता है कि मुस्लिम 4 बीवियां करता है और उनसे 40 बच्चे पैदा करता है। ये बे-अक़्ल लोग होते हैं। ये दिन रात मुस्लिमों के साथ उठते बैठते हैं। ये मुस्लिमों के घरों में जाते हैं और उन्हें अपने घरों में बुलाते हैं। इन्होंने जीवन में दो चार मुस्लिम भी नहीं देखे होते, जिनके  4 बीवियाँ और 40 बच्चे हों। तब भी ये ऐसी बातों पर विश्वास कर लेते हैं और उस पर आपसे सवाल करते हैं।

या फिर वह किसी संस्था का प्रशिक्षित कार्यकर्ता होता है और वह आपको हराने की तकनीक सीखा हुआ है। वह उस तकनीक को आप पर आज़माने के लिए बेचैन है।

इस तरह आपसे इस्लाम पर बहस करने वाले 2 तरह के लोग हुए:

1. बे-अक़्ल और

2. ट्रेन्ड वर्कर्स

बे-अक़्ल लोगों के और ट्रेन्ड वर्कर्स के सभी सवालों के जवाब बहुत सी किताबों और वीडियोज़ में दिए जा चुके हैं। आप उन किताबों और वीडियोज़ को देखकर उनके जवाब दे सकते हैं! आप बार बार जवाब देंगे तो आप भी जवाब देने में ट्रेन्ड हो जाएंगे और जब आप ट्रेन्ड हो जाएंगे तो आप इन्तेज़ार करेंगे कि कोई आकर मुझसे इस्लाम पर बहस ही कर ले ताकि मैं उसे हक़ीक़त बता सकूं।

अब आप दूसरे धर्म के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की मानसिकता और जोश को समझ सकते हैं कि वे आपसे अपने धर्म की रक्षा कर रहे हैं और आप उनसे अपने धर्म की रक्षा कर रहे हैं।

पहले ये बहसें कम थीं। अब पहले से ज़्यादा हैं और ये लगातार बढ़ रही हैं।

जब आपका तजुर्बा काफ़ी बढ़ जाएगा। तब आप इन दोनों तरह के लोगों को नज़रंदाज़ करेंगे क्योंकि ये वक़्त ज़्यादा चूस लेते हैं और फिर भी उन्हीं बातों को बार बार पूछते हैं। जिनके जवाब आप दे चुके होते हैं।

इसलिए अगर आप इनके जवाब नहीं देते या वे किताबें नहीं पढ़ते, जिनमें इन वायरल सवालों के जवाब हैं तो भी ठीक है।

...और अगर आप बिना कुछ पढ़े उनके हर सवाल का जवाब देना चाहें तो भी दे सकते हैं।

मान लीजिए एक आर्य समाजी भाई आपसे आपके धर्म पर सवाल करता है तो आप कह दें कि मुझे अपने धर्म की जानकारी कम है लेकिन मैं अपने धर्म पर संतुष्ट हूँ। आपको अपने सवालों के जवाब चाहिएं तो आप किसी ऐसे आलिम से सवाल करें, जिसे अपने और आपके, दोनों के धर्म की जानकारी हो। आपकी बातों से लगता है कि आप भी अपने धर्म से पूरी तरह संतुष्ट हैं?

वह कहेगा कि हाँ, मैं अपने धर्म से संतुष्ट हूँ।

तब आप उससे कहें कि जब आप अपने धर्म से संतुष्ट हैं तो आप उस पर चलें भी तो सही। जैसे कि आप अपने धर्म के चार आश्रमों का और‌ 16 संस्कारों का पालन करें। सबसे पहला आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम है। आप इस पर चलें तो मुझे ख़ुशी होगी। आप दोनों टाईम हवन करें। मुझे लगेगा कि हाँ, ऐसा करना संभव है।

बात यह है कि ब्रह्मचर्य आश्रम में किसी पराई लड़की को देखना, सुनना और छूना मना है। आर्य समाजी को पढ़ाई, नौकरी और मनोरंजन सब करना है। वह पराई लड़की को देखने, सुनने और छूने से बचने के संकल्प पर चला तो उसकी पढ़ाई, कमाई और मनोरंजन सब चला जाएगा। दो टाईम हवन करना भी उसके बस की बात नहीं है। उसके बस की बात केवल इस्लाम की कम जानकारी रखने वालों से बहस करना है और वह बहस आपने टाल दी और आपने उसे बेमक़सद कर दिया।

उसका मक़सद अपने धर्म पर चलना नहीं है बल्कि आपसे बहस करके आपको हराना है। ऐसी फ़ालतू बहसों को यही एक जवाब देकर टाल दिया करें।

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आप जिस भी दीन-धर्म की रक्षा करना चाहें तो उसकी रक्षा का केवल एक तरीक़ा है और वह है उसकी शिक्षाओं पर चलना।

जिस धर्म की शिक्षाओं पर चला गया। वह धर्म बच गया। लोगों ने जिस धर्म की शिक्षाओं पर चलना छोड़ दिया। वह मिट गया।

आप दूसरे लोगों से बहस करके अपने धर्म की रक्षा नहीं कर सकते।

दूसरे लोग आपको आपके धर्म से नहीं हटा सकते, जब तक कि आप ख़ुद न हटना चाहें।

जब दूसरे लोग आपको आपके दीन से हटाने की कोशिश करते हैं तो आपके अंदर उस दीन पर जमने का जोश‌ और ज़्यादा बढ़ता है और अपनी ग़फ़लत की वजह से आप जिस दीन से दूर हो चुके थे। आप उसे पूरी शिद्दत से पकड़ लेते हैं।

दीन से हटाने की कोशिशें मोमिनों को ईमान पर ज़्यादा शिद्दत से जमा रही हैं।

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दीन धर्म पर डिबेट में, बहस में एक आदमी के जीतने से यह तय नहीं होता कि उसका पक्ष सत्य है। उसका दीन धर्म सच्चा है क्योंकि एक ही धर्म के पक्ष में दो आदमी दो जगह डिबेट करें तो एक आदमी हार जाता है तो दूसरा जीत जाता है। डिबेट में जीतना धर्म के गुण पर नहीं बल्कि बहस करने वाले के गुण और अभ्यास पर डिपेंड करता है।

जब किसी धर्म का एक ट्रेन्ड वर्कर आपसे दीन धर्म पर बहस शुरू करता है तो वह हमेशा उस बिन्दु पर बात करेगा। जिसमें उसकी प्रैक्टिस बहुत है। आप उससे उसी मैदान में बहस करेंगे तो वह आप पर भारी पड़ेगा या हारने में आपको थका देगा। अक्सर उसे सुधरना उसके बाद भी नहीं है।

आम तौर पर आदमी उसी बिन्दु पर बहस में जवाब देने लगते हैं, जिस पर पहले ने बात शुरू की है। मैंने ऐसे लोगों को अपने मनोरंजन का साधन बना लिया है। मैं सबसे पहले उसे उस विषय से अलग ले जाता हूँ, जिसमें उसकी प्रैक्टिस ज़्यादा है और वह जीतने के जोश में सजग नहीं होता। वह उधर चल पड़ता है, जिधर मैं ले जाता हूँ और फिर वह निरूत्तर हो जाता है।

मज़ेदार क़िस्सा:

एक दिन एक आर्य समाजी भाई ने मुझसे मैसेंजर में सवाल किया कि 'परमेश्वर निराकार है या साकार?'

मेरी जगह कोई दूसरा मुस्लिम होता तो वह तुरंत उसे समझाने लगता की परमेश्वर कैसा है?

मुझे पता है कि आर्य समाजी को बहस की लत होती है और उसे समझना कुछ नहीं होता। मैं इनके साथ फ़ालतू बहस में समय नहीं खपाता।

मैंने अपनी डेवलप की हुई तकनीक उस पर प्रयोग करते हुए कहा कि परमेश्वर को ख़ुद पता है कि वह कैसा है। यह प्रश्न आप मुझसे क्यों कर रहे हैं?

उसे इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी। उसका माइंड बहस के उस ढर्रे से अलग हट गया, जिसका वह आदी था।

उसने कहा कि मैं गुरूकुल में शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ। मैं आपसे तर्क वितर्क करके ब्राहमण बनना चाहता हूँ।

मैंने उस भाई से पूछा कि आपने कितना पढ़ लिया है?

उसने कहा कि अभी मैंने एक दर्शन पढ़ा है।

मैंने उससे पूछा कि जब आप गुरूकुल में एक दर्शन पढ़कर ब्राह्मण नहीं बन पाए तो आप मुझसे बहस करके कैसे ब्राह्मण बन जाएंगे?

सवाल करना आसान काम होता है। सवाल करने वह आया था। मैंने उसे उसके सवाल का जवाब नहीं दिया और अब उससे सवाल मैं कर रहा था और वह मुझे संतुष्ट कर रहा था। यह मुझ पर निर्भर हो चुका था कि मैं उसके उत्तर से संतुष्ट हो जाऊँ या उसके जवाब में से कोई बात पकड़कर फिर एक नया सवाल कर दूँ।

मैंने उस आर्य समाजी भाई से कहा कि मैं अपने दीन के अनिवार्य कर्तव्यों नमाज़, ज़कात और रोज़ा आदि का पालन करता हूँ। अगर आपको मुझसे बहस करनी है तो आपको अपने वैदिक धर्म के अनिवार्य कर्त्तव्यों का पालन करके मेरे बराबर की हैसियत में आना पड़ेगा। जब आप मेरी बराबरी की हैसियत में आ जाएं तो आप मुझसे बहस कर लें। क्या आप दोनों टाईम हवन करते हैं?

वह पहले तो टालता रहा लेकिन फिर उसने मान लिया कि वह दो टाईम हवन नहीं करता।

मैंने कहा कि आर्य समाजी वैदिक धर्म के अनुसार जो दो टाईम परमेश्वर का ध्यान और हवन नहीं करता उसे शूद्रवत् समझकर अर्थात् मूर्ख समझकर सभा से बाहर कर देना चाहिए।

'और जो ये दोनों काम सायं और प्रातःकाल में न करे उस को सज्जन लोग सब द्विजों के कर्मों से बाहर निकाल देवें अर्थात् उसे शूद्रवत् समझें।।'

-सतयार्थप्रकाश, चतुर्थ समुल्लास 


मैंने कहा कि शूद्र का अर्थ आप लोग मूर्ख बताते हैं। मूर्ख से तर्क वितर्क करने के लिए न वेद कहता है और न क़ुरआन। जब तक आप दोनों समय  परमेश्वर का ध्यान और अग्निहोत्र नहीं करते। तब तक आप शूद्र अर्थात मूर्ख रहेंगे, ब्राह्मण नहीं बन सकते और न ही आपको किसी से विद्वानों की तरह बहस करने का अधिकार है।

उस आर्य समाजी भाई ने इस बात को स्वीकार किया कि मेरी बात सही है।

आपने देखा कि एक तकनीक के प्रयोग से वह विद्वान शूद्र सिद्ध हो गया, जोकि मुझसे बहस करके ब्राह्मण बनना चाहता है।

आर्य समाजी परमेश्वर के निराकार होने पर महीने भर बहस कर सकता है परन्तु अपने धर्माचरण पर दो मिनट में शाँत हो जाएगा।

परमेश्वर कैसा है? इस पर किसी आर्य समाजी से बात करने से पहले यह ज़रूर देख लें कि वह ख़ुद कैसा है और क्या करता है??

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एक आर्य समाजी भाई मेरे मित्र हैं। वह एक वैद्य हैं। मैं उनका बहुत ज़्यादा आदर उनके अच्छे स्वभाव के कारण करता हूँ। वह भी मुझसे बहुत प्रेम करते हैं और रोज़ ही मुझे व्हाट्स एप के ज़रिए शुभकामनाओं के मैसेज करते हैं।

मैं एक दिन सलीम भाई की दवाओं की दुकान पर गया तो सलीम भाई ने मुझे आर्य वैद्य जी से मिलवाया। मैंने उनसे बात की तो पता चला कि वह दोनों समय हवन करते हैं। यह मेरे लिए सचमुच हैरत की बात थी। बहुत ही कम आर्य समाजी दोनों समय ध्यान और हवन करते हैं।

मैंने उनसे जितनी भी देर बात की। मुझे यही लगा कि मैं एक बहुत अच्छे इंसान से बात कर रहा हूँ। सनातनी पंडितों से बात करते हुए मुझे ऐसा सैकड़ों बार फ़ील हो चुका है लेकिन किसी आर्य समाजी के साथ बात करते हुए ऐसा पहली बार फ़ील हुआ। उन्होंने मेरी बात का, इस्लाम और क़ुरआन का खंडन नहीं किया। बिना खंडन वाला आर्य समाजी मैं पहली बार देख रहा था।

मैंने हैरत ज़ाहिर करते हुए आर्य बंधु से कहा कि आप मेरी बातों में कमियाँ क्यों नहीं निकाल रहे हैं? आर्य समाजियों का यह स्वभाव तो नहीं होता।

आर्य वैद्य जी ने कहा कि मेरे पिताजी आर्य समाजी थे। वह एक दुकान करते थे। जो भी व्यक्ति उनके पास आता था। वह उसके धर्म-मत में कमियाँ बताया करते थे। परिणाम यह हुआ कि लोगों ने उनके पास आना बंद कर दिया और वह अलग थलग पड़  गए थे। इससे शिक्षा लेकर मैंने अपना स्वभाव बदल लिया है।

एक दिन वह अपनी पत्नी के साथ मेरे घर तशरीफ़ लाए। उनकी पत्नी का स्वभाव उनसे भी ज़्यादा अच्छा है। उनकी पत्नी एक समाज सेविका हैं और पूरा ज़िला उन्हें जानता है। उन दोनों ने मुझसे अपने घर आने का बार बार आग्रह किया। उसके बाद भी वे दोनों फ़ोन पर मुझे अपने घर बुलाते रहे। एक दिन मैं उनके घर गया और जब नमाज़ अदा करने का वक़्त आया तो उन्होंने मुझे पानी, चादर और एक रूम दिया। जहाँ मैंने ऐसे ही शांति से नमाज़ अदा की, जैसे मैं अपने घर में नमाज़ करता हूँ।

मेरे आर्य वैद्य मित्र जी ने पूरी ज़िन्दगी ईमानदारी से मेहनत करके जायज़ तरीक़े से थोड़ा कमाया और उसे अपने बच्चों पर लगाया। उनके लड़के भी पढ़ लिखकर समाज में अच्छी हैसियत में आ गए। अब कुछ समय पहले वैद्य जी नोएडा चले गए हैं। वह नोएडा से भी मुझे मैसेज और कॉल करते रहते हैं।

मैं उनकी मुहब्बतों का दिल से बहुत ज़्यादा शुक्रगुज़ार हूँ।

///

आर्य समाजी प्रचारक अपनी मान्यता के अनुसार सत्य का मंडन और असत्य का खंडन करने को बहुत उतावला होता। यह आर्य समाज की शक्ति है। जिसकी वजह से वह पहचाना गया। जिसकी वजह से वह आगे बढ़ा।

और‌ यही उसकी कमज़ोरी भी है। जिसकी वजह से वह आगे नहीं बढ़ रहा है। जिसकी वजह से आम हिंदू समाज ने उसके तरीक़े को एक साईड कर दिया।

जब एक आर्य समाजी अपनी नज़र में असत्य का खंडन कर रहा होता है तो वह पौराणिकों, सिखों, बौद्धों, जैनियों, ईसाईयों और मुस्लिमों के महापुरुषों के नाम बहुत ज़्यादा तिरस्कारपूर्ण तरीक़े से लेता है और उनकी मज़ाक़ भी उड़ाता है। जिससे उन धर्मों के मानने वालों के दिलों में आर्य समाजी प्रचारक के लिए तीव्र घृणा पैदा होती है और उनका दिल उस आर्य समाजी प्रचारक के लिए, उसके संदेश के लिए पूरी तरह बंद हो जाता है। 


इस तरह ख़ुद आर्य समाजी प्रचारक ही अपने विशेष स्वभाव के कारण लोगों को उन्हीं के धर्म पर जमाए रखते हैं।

दूसरे धर्म के लोगों को प्रभावित करने वाली चीज़ मधुर भाषा, सम्मान और सेवा है।

आम तौर पर आर्य समाजी प्रचारक से एक ईसाई और एक मुस्लिम को ये तीनों बातें नहीं मिलतीं। सो वे उससे प्रभावित नहीं होते। इसके बजाय उन्हें आर्य समाजी प्रचारक से कठोर वचन और तिरस्कार मिलता है तो वे उसे अपना दुश्मन समझने लगते हैं। इस तरह एक आर्य समाजी अपने धर्म प्रचार का अंतिम संस्कार ख़ुद ही कर लेता है।

#Islam धर्म का पक्ष रखने वाले #muslim नौजवान आर्य समाजियों के तरीक़े के मुताबिक़ हरगिज़ किसी धर्म की और उस धर्म के महापुरूषों की आलोचना न करें वर्ना उनके दिलों के दरवाज़े भी बंद हो जाएंगे।

हरेक धर्म का आदमी अपने महापुरुषों से भावनात्मक स्तर पर बहुत गहरा जुड़ाव रखता है और इस स्तर पर जुड़े हुए लोगों से तर्क और आलोचना करते हुए उनकी भावनाओं के सम्मान का बहुत ज़्यादा ख़याल रखना चाहिए।

मैं स्वामी दयानंद जी का नाम जहां भी लिखता हूँ, अपने आर्य समाजी भाईयों की भावना को ध्यान में रखते हुए आदरसूचक शब्दों के साथ लिखता हूँ।

#कहने_का_मक़सद यह है कि गुड़ न दो तो कम से कम गुड़ जैसी बात तो करो।

#dawah_psychology कहती है कि दूसरे धर्म के लोगों को आपसे बात करके ख़ुशी महसूस होनी चाहिए।

Friday, May 21, 2021

#isme_azam kya hai? इस्मेे आज़म कौन सा नाम है, जिसके साथ दुआ माँगने से दुआ ज़रूर क़ुबूल होती है?

 (1)

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#surahikhlas 

कह दीजिए कि वह अल्लाह अहद (एक) है।

अल्लाह अस्समद है (यानी आत्मनिर्भर, बेनियाज़ self sufficient है।)

न उसने किसी से जन्म लिया और न उसने किसी को (मनुष्यों की तरह) जन्म दिया।

न ही कोई उसके कुफ़ू (बराबरी) का है।

एक्स्पलेनेशन:

मैंने अपने बच्चों को बताया कि मुझे क़ुरआन मजीद की यह सूरह बहुत पसंद है और मैं इसे बहुत ज़्यादा पढ़ता हूँ। इस सूरह से हमारा माइंड अल्लाह के बारे में क्लियर हो जाता है कि वह कैसा है और हम उसे तुरंत ही देखने लगते हैं।

जब इंसान चारों तरफ़ फैली हुई कायनात को देखता है तो वह कहता है कि मैं इसमें नियम को देख रहा हूं कि हर तरफ नियम काम कर रहे हैं। रात के बाद दिन आती है और दिन के बाद रात आती है यह प्रकृति का नियम है। आम का बीज बोते हैं तो आम निकलता है और और बबूल बोते हैं तो बबूल ही निकलता है जैसा बीज बोया जाता है वैसा ही पेड़ निकलता है और वह पेड़ अपनी प्रकृति के अनुरूप ही फल देता है यह प्रकृति का नियम है। मैं नियम को काम करते देख रहा हूं।

अब अगर कोई आदमी उससे पूछे की नियम का साइज़ क्या है, वह कितने फ़ुट का है या उसका आकार क्या है? नियम त्रिकोण है या चतुर्भुज है? या नियम का रंग क्या है? वह बैंगनी कलर का है या पीला है? जब आप प्रकृति में नियम देख रहे हैं तो कृपया उसका साइज़, आकार और रंग भी बता दें।

इस बात को सुनकर हरेक आदमी हंसेगा कि हमारे देखने का मतलब यह नहीं है कि हम साइज़, आकार और रंग वाली कोई चीज़ अपनी माँस की आँख से देख रहे हैं बल्कि हम नियम को अपनी अक़्ल से देख रहे हैं कि प्रकृति में नियम है।

नियम बनाने वाले परमेश्वर को भी हम अपनी अक़्ल से देख सकते हैं और अभी देख सकते हैं।

इंसान अपनी अक़्ल से उसे भी देख सकता है जिसका साइज़, आकार और रंग न हो।

जब रस्सी पर लटके हुए कपड़े और पेड़ के पत्ते हिलते हैं तो लोग कहते हैं कि हम देख रहे हैं कि हवा चल रही है। हालाँकि कोई भी हवा को नहीं देखता, हरेक कपड़ों और पत्तों को देखता है। वे कपड़े और पत्ते हिलते देखकर अपनी अक़्ल से इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि कोई है, जो इन्हें हिला रहा है। वही हवा है। हर तरफ़ चीज़ें हिल रही हैं। जिधर भी हम चेहरा घुमाते हैं। हम हर तरफ़ हवा देखते हैं। ऐसे ही हम हर तरफ़ नियम देखते हैं। ऐसे ही हम जिधर भी देखते हैं, अपनी अक़्ल से अल्लाह को देखते हैं।

अक़्ल बहुत इम्पोर्टेंट हैं। अक़्ल न हो तो इंसान अपने पैदा करने वाले को नहीं पहचान सकता।

अक़्ल न हो तो हम यह नहीं जान पाते कि हमारा माइंड चित्रों की भाषा में विचार करता है। हमने बादशाह देखा है। हमने उसे सिंहासन पर बैठे हुए देखा है। हमने उसे हुक्म देते हुए देखा है। वह बादशाह सब पर नज़र रखता है कि कौन क्या कर रहा है।

जब अल्लाह अपने परिचय में ख़ुद को बादशाह कहता है और वह कहता है कि वह सिंहासन (अर्श) पर बैठा है और वह हुक्म देता है तो हमारा माइंड एक चित्र बना लेता है कि एक बड़ा सा इंसान अर्श पर बैठकर हुक्म दे रहा है। वह ऊपर बैठकर हमें नीचे की तरफ़ काम करते हुए देख रहा है।

जब हम क़ुरआन मजीद पढ़ते हैं तो हमारा माइंड ऐसे चित्र बनाता है क्योंकि शब्द सुनकर सोचने समझने की प्रोसेस में यही होता है। जो चित्र हमारा माइंड बनाता है, वह हमारी बनाई हुई चीज़ है और अल्लाह किसी चीज़ जैसा नहीं है।

हिंदुओं ने अंदर के काल्पनिक चित्र को बाहर भी बना दिया ताकि दूसरे भी देख लें कि वे अपने मन में परमेश्वर को किस रूप में देखते हैं। परमेश्वर की ज़्यादा शक्ति दिखाने के लिए उन्होंने उसकी मूर्ति में ज़्यादा हाथ बना दिए। उनके विद्वानों ने भी माना है परमेश्वर इस मूर्ति जैसा बिल्कुल नहीं है।

एक इंसान अपने अंदर बन रहे चित्रों को अपने मन से हटा दे और बस अल्लाह के होने को अपनी अक़्ल से जाने कि 'वह है' तो वह अल्लाह को देख लेगा।


'वह है' को ही अरबी में हुवा और हिब्रू में यहोवा कहते हैं।

सूरह इख़लास की पहली आयत ही दिल के ईमान को ख़ालिस कर देती है। वह दिल से हरेक चीज़ को हटा देती है, जिसे हमने अपना रब और इलाह बनाकर दिल में जमा रखा था। जब तक ये तस्वीरें और ये बुत दिल में रहते हैं, इंसान अपने ख़ुदा को नहीं देख पाता। जबकि वह हर तरफ़ है।

लोग पूछते हुए घूमते हैं कि क्या ख़ुदा है? हमें तो परमेश्वर नहीं दिखता। बताओ गॉड है तो वह कहाँ है?

यह ऐसा ही है जैसे नदी में रहते हुए मछली पूछे कि पानी कहाँ है?

मेरे बच्चों सूरह इख़लास पढ़ो और इसे अच्छी तरह समझो ताकि तुम अपने रब को देख लो। जब तुम क़ुरआन पढ़ोगे तो कभी बोर न होओगे। मुझे अकेलापन बुरा नहीं लगता। कोई साथ होता है तो मैं क़ुरआन मजीद की आयतें उसे सुनाकर उनका मतलब समझाता हूँ और इससे मेरा दिल ख़ुश होता है। जब मैं अकेला होता हूँ तो मुझे क़ुरआन की आयतें अपनी आत्मा में याद आने लगती हैं और मैं उनके अर्थ पर विचार करने लगता हूँ और जब वे मेरी समझ में आती हैं तो इससे भी मेरा दिल ख़ुश होता है। जब दिल ख़ुश होता है तो इंसान को अपने अंदर अच्छा महसूस होता है। इस यूनिवर्स में फलने फूलने के लिए #feelgood बहुत ज़रूरी है।

(नोट: अभी एक आयत का एक्सप्लेनेशन भी पूरा नहीं हुआ, जो मैने अपने बच्चों को समझाया।)

देखें: Blog:allahpathy.blogspot.com

(2)

*Allahpathy part 2*

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पिछली पोस्ट से जोड़कर आगे पढ़ें:

'हुवा' एक नाम है। किसी को पुकारना हो तो अरबी में 'या' शब्द लगाकर पुकारते हैं। हुवा को पुकारना हो तो 'या हुवा' कहते हैं। इस नाम से केवल उसके 'वुजूद' पर ध्यान जाता है कि वह जो है सो है।

या हुवा को याहू भी पढ़ा जाता है। यह नाम एक गुप्त रहस्य है।

For Jewish people YHWH (YAHWEH) is the most holy name of God. Traditionally, religious Jews today do not often say this name aloud. This is because it is believed to be too holy to be spoken. However, they often use substitutes when referring to the name of their God. For example, they use HaShem ("The Name") or Shem HaMeforash (“the indescribable Name”).

मूसा ने परमेश्‍वर से कहा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे यह कहूँ, ‘तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझसे पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?” 

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’।” 

फिर परमेश्‍वर ने मूसा से यह भी कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘तुम्हारे पूर्वजों का परमेश्‍वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, इसहाक का परमेश्‍वर, और याकूब का परमेश्‍वर, यहोवा, उसी ने मुझ को तुम्हारे पास भेजा है। देख सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी-पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा।’ 

-निर्गमन 3:13-15

हिब्रू में YAHWEH यहोवा का अर्थ है  “मैं जो हूँ सो हूँ" I AM THAT I AM.

इस तरह हम हुवा नाम से "मैं हूँ" (अरबी में अना और संस्कृत में अहम्) नाम तक पहुँच जाते हैं। यह एक गुप्त भेद है। जिसे आम तौर से बताया जाए तो लोग किन्तु परन्तु करेंगे। सो मैं इसे यहाँ न बताऊंगा।

लेकिन इस नाम के साथ इंसान की फ़लाह और कल्याण जुड़ा है। इसलिए फिर भी मैं इतना बता दूँ कि 'मैं हूँ' उस वुजूद के लिए बोला जाता है जो अपने होने का एहसास रखता है।

मिसाल:

एक इंसान भी अपने लिए 'मैं हूँ' बोलता है। 

इंसान में जिस्म से अलग एक हक़ीक़त है। वही "मैं हूँ। जब भी इंसान के वुजूद में कोई डर या विश्वास जम जाता है तो उसके डर या विश्वास के अनुसार ही उसके जीवन में कुछ घटनाएं घटित हो जाती हैं। ख़ुद आपने भी कई बार यह कहा होगा कि मुझे जिस बात का डर था, वही बात हो गई।

आपके डर ने ही उस बुरी घटना को आपके जीवन में आकर्षित किया है। इसलिए अपने कल्याण के लिए "मैं हूँ" को यानि अपने वुजूद को डर और बुरे विश्वास (वसवसे) से पाक किया जाता है। 

ख़ुद को पाक रखना है। इसीलिए ग़ुस्ल (स्नान) और वुज़ू किया जाता है ताकि याद रहे कि हमें अपने आप को अंदर से भी पाक करते रहना है। हरेक दीन धर्म में पवित्र रहने और स्नान करने की शिक्षा मौजूद है।

मुस्लिम आलिम हर ज़माने में रब के एक गुप्त नाम #ismeazam की तलाश में रहे हैं। इमाम बोनी रहमतुल्लाहि अलैह ने एक पूरी किताब शम्सुल मआरिफ़ इस्मे आज़म की तलाश में लिखी है और मुझे हैरत है कि उन्होंने तौरात में आए नाम "मैं जो हूँ सो हूँ" को भी अपनी किताब में जगह दी है। उनके अलावा मुझे दूसरे किसी आलिम की‌ इस्मे आज़म पर  रिसर्च में इस हिब्रू नाम का तज़्करा न मिला।

बहरहाल जब भी 'हुवा' या 'हू' कहकर अपने रब का ध्यान करोगे तो केवल उसके अस्तित्व (वुजूद) की तरफ़ ध्यान जाएगा। इससे आपको इख़लास नसीब हो जाएगा।

दुआ के दो रूक्न (स्तंभ pillars) हैं:

इख़लास और यक़ीन।

जब ये दोनों होते हैं तो दुआ वुजूद में आ जाती है और इनमें से एक भी न हो तो दुआ का वुजूद नहीं होता।

कई बार आदमी दुआ करता है लेकिन वह नहीं जानता कि इख़लास और यक़ीन के बिना या इनमें से एक न हो तो भी दुआ हक़ीक़त में दुआ नहीं होती।

और कई बार वह नहीं जानता कि वह इख़लास और यक़ीन को कैसे हासिल करे।

सूरह इख़लास को समझने और बार बार पढ़ने से ये दोनों हासिल हो जाते हैं।

अल्हम्दुलिल्लाह।

Blog: allahpathy.blogspot.com

(3)

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#हुवा का सिम्पल अर्थ है वह, He.

जब हम इस शब्द को परमेश्वर के लिए बोलते हैं तो यह केवल अस्तित्व का बोध कराता है, उसके किसी गुण का नहीं।

हक़ीक़त में वही परमेश्वर हरेक वस्तु और हरेक व्यक्ति के अस्तित्व का स्रोत है।

एक व्यक्ति अपने होने को फ़ील करता है कि 'मैं हूँ' तो वह अपने अस्तित्व को फ़ील करता है। जिसे वह आत्म या आत्मा कहता है और यह आत्म या आत्मा शरीर से अलग एक हक़ीक़त है। 

जब आप लेटकर आँखें बंद करके पूरी तरह #रिलैक्स्ड होकर अपने होने को फ़ील करते हैं और इसी हाल में जागे रहते हैं या सो जाते हैं तो अपने आपको जानने की #नीयत के कारण आप पर आपका अस्तित्व ख़ुद को और ज़्यादा प्रकट करता है।

आपका अस्तित्व एक रेफ़्लेक्शन और एक ज्योति है असल अस्तित्व की। आप हमेशा हक़ीक़ी वुजूद से जुड़े हुए होते हैं।

'मैं हूँ' या 'आत्मा' या 'ख़ुदी' एक नाम है, जिसमें इंसान ज़िंदा और क़ायम है। यह रब का एक पोशीदा नाम है, जो उसने हमें दिया ताकि हम जीवन पाएं। 'मैं हूँ' में हम जीवित हैं।

जब कोई व्यक्ति इस नाम के साथ कोई गुण मान लेता है कि मैं ग़रीब हूँ, मैं ग़ुलाम हूँ, मैं परेशान हूँ 

...तो उसके विश्वास के अनुरूप ही उसके जीवन में और ज़्यादा बुरी परिसथितियाँ घटित होती हैं और वह व्यक्ति वही बना रहता है जो वह अपनी आत्मा में विश्वास रखता है। जिसे ईमान बोलते हैं। बाहर की ग़रीबी, ग़ुलामी और परेशानी की वजह अंदर का विश्वास (core belief) है।

जब अपने अंदर के ईमान को सही कर लिया जाता है तो बाहर की ग़रीबी, ग़ुलामी और परेशानी भी घटने और मिटने लगती है। बाहर की परिस्थिति या व्यक्ति इंसान पर कोई ज़ोर और ताक़त नहीं रखते बल्कि अंदर का #अस्तित्व बाहर की परिस्थितियों पर ज़ोर रखता है क्योंकि वही उनका चुनाव करता है कि मुझे क्या बनाना है और क्या भोगना है!

अधिकांश लोग इससे बेशुऊर (अचेत, #unconscious) हैं।

अधिकतर लोग ख़ुद अपने अस्तित्व से अचेत और #अज्ञानी हैं और बहुत लोग अपने अस्तित्व के स्त्रोत से अपने संबंध के प्रति ग़ाफ़िल हैं।

क़ुरआन मजीद के ज़रिए #रब ने लोगों को उनकी अपनी हक़ीक़त के प्रति चेताया है और उन्हें उनकी शक्तियों का ज्ञान दिया है। जिनसे वे ग़रीबी, ग़ुलामी और परेशानी से #मुक्ति पा सकें।

इंसान की शक्ति उसका #ईमान और #नीयत है। यह सही हो जाए तो जो पुराने ईमान से बनी हुई बुरी परिस्थितियां हैं, वे मिटने लगती हैं क्योंकि उन्हें अब हमारे अंदर के ईमान से सपोर्ट नहीं मिलती।

जब हम हुवा या 'हू' या 'याहू' कहकर कुछ देर केवल अस्तित्व के प्रति सजग होते हैं तो यही सजगता #ध्यान है। इस हाल में हमारा #माइंड परिस्थितियों से हट जाता है और हमें तुरंत शाँति मिल जाती है लेकिन यह अस्थायी होती है क्योंकि इस हाल से बाहर आते ही फिर से पुरानी परिस्थितियां दबाव बना लेती हैं।

उन परिस्थितियों को बदलने के लिए हमें इस पूरे मैकेनिज़्म को समझना होगा कि अस्तित्व कैसे काम करता है?

जोकि एक पूरी किताब का विषय है।

हालात बदलने के लिए ईमान के बाद हिकमत भरा अमल ज़रूरी है।

और यह #हिकमत भरा अमल भी आत्मा से ही शुरू होता है।

अगर यह विज़न और विश्वास है कि 'मैं मज़लूम हूँ' तो इस विश्वास की डिमांड के अनुरूप हमेशा कोई ज़ालिम ऊपर बैठा रहेगा। वह नहीं उतरेगा। वह नए नए कष्ट देता ही रहेगा ताकि आपका विश्वास आप पर घटित हो। लोग अपने ग़लत विश्वास के मारे हुए हैं। जब क़ौमी सतह पर यह ग़लत विश्वास जड़ पकड़ लेता है कि 

'हम मज़लूम हैं' तो फिर वे एक बुरे तिलिस्म की रचना करके उसके दुष्चक्र में फंस जाते हैं।

इस #तिलिस्म से मुक्ति के लिए एक नए #हैल्दी #विज़न की रचना करना ज़रूरी है। जिसमें आप ख़ुद ग़ालिब हों और दुश्मन पाँव तले की चौकी हों, जैसा कि #नबियों का विज़न होता था। जिसे वे सामने रखकर चलते थे।

#यहोवा ने मेरे स्वामी से कहा,

    “तू मेरे दाहिने बैठ जा, जब तक कि मैं तेरे शत्रुओं को तेरे पाँव की चौकी न कर दूँ।”

-ज़बूर 110:1

ख़ुद को अकेला और कमज़ोर मानना एक ग़लत विश्वास है।

क़ुरआन कहता है कि #अल्लाह क़वी यानी ताक़त वाला है।

#क़ुरआन कहता है कि

'व हुवा म'अकुम' यानी और वह तुम्हारे साथ है।

यह एक #हक़ बात है और यह एक सही विश्वास है।

जब हम अपने अकेले और कमज़ोर होने का माइंडसेट लेकर काम करते हैं तो हमारे काम ख़राब होते हैं और

जब हम ताक़त वाले रब के अपने साथ होने का #माइंडसेट लेकर काम करते हैं तो हमारे दुश्मनों के काम ख़राब होने लगते हैं और

हमारे काम बनने लगते हैं।

#परमेश्वर ने हमारे #कल्याण की शक्ति हमारी #आत्मा में रखी हुई है।

आत्मा 'मैं हूँ' कहती है।

यह एक #पवित्र शक्तिशाली नाम है।

इसका सही प्रयोग सीखने की ज़रूरत है।

मैं हूं के साथ अच्छे गुण बोलो कि मैं शुक्रगुजार हूँ।

I AM #BLESSED BEYOND MEASURE.

...तो इससे आपका हाल नेचुरली ख़ुद संवरेगा।

अच्छे अवसर और अच्छे लोग ख़ुद मिलेंगे।

#कहने_का_मक़सद यह है कि 

'हुवा' का ध्यान।

है परम ज्ञान ।।

#अगरअबभीनाजागेतो रब की शक्ति से अपने हक़ में कल्याणकारी काम कैसे करोगे?

(4)

🌴🌴🌴🕋🌴🌴🌴🌿

#ईद #मुबारक

#ईदी के रूप में #आत्मज्ञान का तोहफ़ा:

क़ुल हुवल्लाहु अहद।

यानी कह दीजिए वह अल्लाह अहद (एक) है।

-क़ुरआन, सूरह इख़लास

मौलाना शम्स नवेद उस्मानी रहमतुल्लाहि अलैह ने एक दिन मुझे इस आयत का मतलब बताते हुए कहा कि 'अरबी में अहद उसे कहते हैं जो एक होकर एक हो। जैसे रूह और जिस्म से मिलकर 'एक' इंसान बना है तो इसे अहद न कहेंगे। यह गिनती में एक है। इसके एक होने को अरबी में वाहिद कहेंगे।'

अल्लाह वाहिद भी है और अहद भी। इंसान का एक जिस्म भी बहुत सारी हड्डियों और नसों से मिलकर बना है। वह वाहिद है, #अहद नहीं।

मैं आपको 'अहद' का गुण समझाने के लिए किस निशानी से मिसाल दे सकता हूँ?

यह आपकी आत्मा और शुऊर (चेतना consciousness) है, जो अपने होने का एहसास रखती है कि 'मैं हूँ'। यह एक होकर एक है। यह अहद की उम्दा मिसाल है। आप ख़ुद अल्लाह की निशानी हैं। आप ख़ुद पर ग़ौर करके अल्लाह को पहचान सकते हैं कि अल्लाह अहद है और अहद होना क्या होता है!

#अल्लाह के गुणों का कीर्तन आत्मज्ञान की कुंजी है।

#अगरअबभीनाजागेतो आत्मज्ञान से कल्याण कैसे पाओगे?

(5)

🌴🌴🕋🌴🌴🐪🐏🌳

#अल्लाह नाम उस हस्ती के लिए बोला जाता है जो हक़ीक़ी माबूद यानी वास्तविक हाकिम है। जिसका हुक्म ज़मीन और आसमान में क़ायम है। अल्लाह शब्द का अर्थ 

हक़ीक़ी माबूद है।

लेकिन इसके और भी कई अर्थ हैं जैसे कि जो हैरत में डालता है और जिसकी तरफ़ दिल खिंचता है और जिससे वालिहाना #मुहब्बत की जाए यानी बहुत ज़्यादा मुहब्बत की जाए।

हम अल्लाह के बनाए हुए कामों को और ख़ुद को देखते हैं तो हैरत में पड़ते हैं और हम सब अपने अंदर अपने पैदा करने वाले के लिए पैदाइशी तौर पर एक प्रेम मौजूद पाते हैं। इंसान शब्द उन्स से बना है। उन्स का अर्थ प्रेम है। जब हम प्रेम करते हैं तो हम अपने वुजूद को सार्थक करते हैं। इंसान शब्द का अर्थ प्रेमी है। #मोमिन बंदा अपने रब से सबसे ज़्यादा प्रेम करता है।

अल्लाह नाम किसी क्रिएशन के लिए या किसी इंसान या फ़रिश्ते के लिए नहीं बोला जाता। यह एक रब के लिए ही ख़ास है, जिसने सबको पैदा किया है।

अल्लाह की हस्ती के लिए बोला जाने वाला नाम अल्लाह भी हैरत में डालता है। इस नाम पर रिसर्च करने वाले आलिम बताते हैं कि अल+इलाह से मिलकर अल्लाह शब्द बना है। जिसका अर्थ हक़ीक़ी #माबूद है।

लेकिन हैरत की बात यह है कि जिन नामों में शुरू में 'अल' लगता है। जब उन नामों के साथ शुरू में पुकारने के लिए 'या' लगाते हैं तो 'अल' हट जाता है जैसे कि अल-रहमान और अल-रहीम में जब या लगाकर दुआ करते हैं तो या रहमान और या रहीम बोला जाता है लेकिन अरबी व्याकरण का यह क़ायदा 'अल्लाह' नाम पर लागू नहीं होता। अल्लाह शब्द में से 'अल' हटाकर 'या' नहीं लगाया जाता बल्कि अल्लाह ज्यों का त्यों रहता है और शुरू में 'या' लगाकर 'या अल्लाह' बोलते हैं। इससे पता चलता है कि अल्लाह नाम भी 'अहद' है यानी न तो यह दो शब्दों के जोड़ से बना है और न ही इसे तोड़ा जा सकता है। यह पूरा एक ही शब्द है। अल्लाह की ज़ात (अस्तित्व) के लिए अल्लाह नाम बहुत ज़्यादा उपयुक्त है। यह नाम भी उसकी सिफ़त (गुण) को ज़ाहिर करता है। यह ख़ासियत किसी दूसरे नाम में नहीं है। आलिम और सूफ़ी इसे सबसे बड़ा नाम मानते हैं। क़ुरआन मजीद में यह नाम बार बार और बहुत ज़्यादा आता है। 

God's name in Arabic, 'Allah,' occurs in the Qur'an 2698 times.

*#अगरअबभीनाजागेतो अल्लाह नाम का अर्थ कैसे पता करोगे?*

(6)

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*कह दीजिए कि वह अल्लाह अहद (एक) है।*

अल्लाह अस्समद है। (यानी आत्मनिर्भर, दूसरों पर निर्भर होने से बेनियाज़ है और self sufficient है।)

न उसने किसी को (मनुष्यों की तरह) जन्म दिया और न ही उसे किसी ने जन्म दिया।

और न ही कोई उसके कुफ़ू (बराबरी) का है।

#Quran #surahikhlas

हम सूरह इख़्लास की पहली आयत के बारे में आपको बता चुके हैं।

दूसरी, तीसरी और चौथी आयत भी बिल्कुल क्लियर है। 

अल्लाह अस्समद है यानी हर चीज़ और हर इंसान अपनी ज़रूरत की पूर्ति के लिए अल्लाह पर निर्भर है लेकिन वह किसी पर निर्भर नहीं है। अपनी मुराद की पूर्ति के लिए लोग उसकी तरफ़ तवज्जो करते हैं।

कोई भी उसकी हस्ती में से नहीं निकला कि उसका अंश या वंश हो और न ही वह ख़ुद किसी में से निकला कि वह किसी का वंश या बेटा हो।

कोई भी अल्लाह के कुफ़ू का नहीं है यानी कोई भी उसके जोड़ और बराबरी का नहीं है। मैंने अपने बच्चों को बताया कि जैसे शैख़ अदब अली अपनी बेटी बाला ख़ातून का निकाह उस्मान से करते हैं तो वह उन्हें एक दूसरे के जोड़ और बराबरी का देखकर ही उनका निकाह करते हैं। एक इंसान के 'कुफ़ू' यानी बराबरी के कई इंसान होते हैं लेकिन कोई भी अल्लाह के कुफ़ू का नहीं है।

*हैरत की बात यह है कि* सूरह इख़्लास की चारों आयतें 'अल्लाह' के वुजूद का परिचय देती हैं और इसी के साथ ये चारों आयतें #अल्लाह नाम के बारे में भी पूरी उतरती हैं।

1. अल्लाह नाम अहद है यानि यह नाम एक होकर एक है। अल्लाह नाम दो शब्दों से मिलकर नहीं बना।

2. अल्लाह नाम अपना अर्थ देने में दूसरे किसी शब्द पर निर्भर नहीं है। यह नाम अपना अर्थ देने के लिए अपने आप में काफ़ी है।

3. न अल्लाह नाम किसी शब्द या धातु से निकला है और न अल्लाह नाम से किसी शब्द ने जन्म लिया है।

4. कोई भी दूसरा नाम अल्लाह नाम के कुफ़ू (बराबरी) का नहीं है। अपनी तरह का यह अकेला नाम है।

*इस नाम की हैरत में डालने वाली ख़ासियत यह है कि* अगर इस नाम से एक एक हरफ़ हटाते रहें, तब भी यह नाम अपने अंदर अल्लाह की हस्ती की तरफ़ ठीक ठीक इशारा और अर्थ देता रहता है।

जैसे कि अल्लाह नाम में से अलिफ़ हटा दें तो लिल्लाह للہ रहता है। जिसका अर्थ 'अल्लाह का' है।

अब इसमें से एक और हरफ़ लाम हटा दें तो 'लहु' शब्द बचता है। जिसका अर्थ है 'उसी का'।

अब इसमें से फिर एक हरफ़ लाम हटा दें तो 'हु' बचता है और 'हु' का अर्थ है 'वह'।

इन चारों शब्दों से क़ुरआन मजीद में आयतें शुरू होती हैं और वहाँ ये चारों शब्द अल्लाह के वुजूद की तरफ़ इशारा देते हैं जैसे कि

1.अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल हय्युल क़य्यूम।

اَللّٰهُ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ١ۚ اَلْحَیُّ الْقَیُّوْمُ

-क़ुरआन मजीद 2:255

2.लिल्लाहि माफ़िस्समावाति वमा फ़िल् अर्ज़।

لله ما في السماوات وما في الأرض

-क़ुरआन मजीद 2:284

3.लहु माफ़िस्समावाति वमा फ़िल् अर्ज़ि वमा बैइनाहुमा वमा तहतस्सरा।

لَهٗ مَا فِی السَّمٰوٰتِ وَ مَا فِی الْاَرْضِ وَ مَا بَیْنَهُمَا وَ مَا تَحْتَ الثَّرٰى(۶)

-क़ुरआन मजीद, सूरह ताहा 6

4. हुवल्लाहुल् लज़ी ला इलाहा इल्ला हू।

ھُوَ اللّٰہُ الَّذِیْ لَآاِلٰہَ اِلَّا ھُوَ

-क़ुरआन मजीद, सूरह हश्र 22

अरबी के हरफ़ 'हा' (H) की वजह से अल्लाह नाम अपने आख़री हरफ़ तक रब के वुजूद की तरफ़ इशारा देता है। इसीलिए अल्लाह के नामों की तासीर पर रिसर्च करने वाले बहुत से ज़िक्र करने वालों ने 'हू' को इस्मे आज़म #IsmeAzam लिखा है।

इस्मे आज़म अल्लाह का वह सबसे बड़ा नाम है जो अधिकतर आलिमों से पोशीदा है और उस नाम की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उसके साथ जो भी दुआ माँगी जाती हे, वह क़ुबूल होती है, चाहे दुआ करने वाला कितना ही गुनाहगार हो।

अब यह *इस्मे आज़म* है या नहीं?

यह बात आप ख़ुद इसके साथ दुआ करके देख सकते हैं।

*#इख़्लास और #यक़ीन के साथ* इस बरकत वाले नाम के साथ *दुआ करें* और इस नाम की तासीर देखें।

#अगरअबभीनाजागेतो ?

#ईद का #ख़ुत्बा #हिदायत वाला

 #ईद का #ख़ुत्बा #हिदायत वाला

मैंने #eidulfitr21 की नमाज़ कोविड19 के #लोगडाऊन की वजह से इमाम बनकर अपने आँगन में अदा की। मेरे पीछे मेरी फ़ैमिली ने नमाज़ बतौर शुक्र अदा की। #अल्हम्दुलिल्लाह!


नमाज़ के बाद मैंने ख़ुत्बा दिया। जिसे मैं आपके फ़ायदे के लिए यहाँ दर्ज कर रहा हूँ। मैंने अपने बच्चों को बताया:

#अल्लाह ने #क़ुरआन #मजीद #रमज़ान के महीने में नाज़िल किया। इसलिए अल्लाह ने रमज़ान को सब महीनों का सरदार ठहराया।

अल्लाह ने क़ुरआन मजीद रमज़ान की एक ख़ास रात में, #शबे_क़द्र में नाज़िल किया।

इसलिए अल्लाह ने #ShabeQadr को हज़ार महीनों से ज़्यादा बेहतर ठहराया।

उर्दू की तरह अरबी में भी बहुत ज़्यादा की तादाद बतानी हो तो हज़ार का लफ़्ज़ बोलते हैं। #शबेक़द्र के हज़ार महीनों की रातों से बेहतर होने का मतलब है कि

#शब_ए_क़द्र बहुत ज़्यादा रातों से अफ़ज़ल और श्रेष्ठ है।

रमज़ान के महीने और #लैलतुल_क़द्र को बड़ाई मिलने की वजह क़ुरआन मजीद है।

अल्लाह ने लोगों को रमज़ान के महीने और लैलतुल_क़द्र की इस बड़ाई की तरफ़ इसलिए ध्यान दिलाया है ताकि लोग क़ुरआन मजीद #HolyQuran की बड़ाई और इम्पोर्टेंस पर ध्यान दें।

रमज़ान का महीना और लैलतुल_क़द्र गुज़र जाते हैं लेकिन #रब का शुक्र है कि क़ुरआन मजीद हमारे पास ही रहता है ताकि हम उसे पढ़ें, समझें और अपने जीवन का मक़सद हासिल करें।

वह लम्हा हमारे जीवन का सबसे बेहतर लम्हा होता है,

जब हम अपने #जीवन_का_मक़सद हासिल करते हैं।

हमारे जीवन का मक़सद क्या है?

हमारे जीवन का स्वाभाविक मक़सद सिर्फ़ यही है कि हमारा भला हो जाए।

हम अपने बच्चों के लिए दिन रात सिर्फ़ इसीलिए काम करते हैं कि हमारे बच्चों का भला हो जाए। हम अपने समाज और अपने देश का भला चाहते हैं।

क़ुरआन मजीद हमें वह सीधा रास्ता दिखाता है जिससे हमारा, हमारे परिवार का, हमारे समाज का और हमारे देश का भला होता है।

पूरे साल हमें भलाई के इसी सीधे रास्ते की डीटेल जानने के लिए बार बार #पवित्र_क़ुरआन पढ़ना ज़रूरी है। यह क़ुरआन हमारी #आत्मा में होना ज़रूरी है ताकि जब क़ुरआन हमारे हाथ में न हो और हम इसे अपनी आँखों से न पढ़ सकें, तब भी हम इसे अपनी आत्मा में पढ़ सकें और इसकी #आयतों पर विचार कर सकें।

जानवर और आदमी में फ़र्क़ करने वाली चीज़ विचार शक्ति और ज्ञान है। ज्ञान इंसान को पशुओं से श्रेष्ठ बनाता है।

सो #परमेश्वर का #ज्ञान पढ़ो, विचार करो, भलाई के सीधे रास्ते पर चलो। इस तरीक़े से तुम श्रेष्ठ मनुष्य बन जाओगे। सदा से श्रेष्ठ मनुष्यों की यही रीति चली आई है।

क़ुरआन आपको यह शक्ति देता है कि आप जिस लम्हे को चाहें, बेहतर और बड़ाई वाला लम्हा बना दें। आप जिस लम्हे को बेहतर और बड़ाई वाला लम्हा बनाना चाहें, आप उसमें क़ुरआन पढ़ें।

#अल्लाहपैथी #allahpathy #मिशनमौजले 

#अगरअबभीनाजागेतो ?

आप अपने कमेंट में बताएं कि आपको यह ख़ुत्बा कैसा लगा?

Sunday, September 20, 2020

वेद और उपनिषद में भी है सबके इलाह अल्लाह का नाम

अल्लाह नाम भी हिन्दुओं के लिए अजनबी नहीं है। अल्लोपनिषद में अल्लाह नाम आया है। अल्लोपनिषद को सनातनी मानते हैं।

सनातनियों के विपरीत चलने वाले जो थोड़े आर्य से समाजी अल्लोपनिषद को नहीं मानते। वे इस नाम में समाहित ‘इलाह‘ को थोड़े अंतर के साथ वेद में भी देख सकते हैं लेकिन वहां भी इसका अर्थ पूज्य ही है।

ऋग्वेद में ईश्वर के लिए जिन नामों को प्रयोग हुआ है, उनमें से एक नाम ‘इला‘ है जिसका मूल तत्व ‘इल‘ या ‘ईल‘ है और जिसका अर्थ है पूजा करना, स्तुति करना। ‘ईल्य‘ का धात्वर्थ है ‘पूजनीय‘। ऋग्वेद के बिल्कुल शुरू में ही यह शब्द प्रयुक्त हुआ है जिसका स्पष्ट अर्थ है कि ‘हे अग्नि ! तू पूर्व और नूतन, छोटे और बड़े सभी के लिए पूजनीय है। तुझे केवल विद्वान ही समझ सकते हैं।‘ (ऋ. 1:1:1 ) 

यह नाम इतना पुरातन है कि लगभग 6 हज़ार साल पहले सुमेरिया की भाषा में ‘ईल‘ शब्द परमेश्वर के लिए बोला जाता था। सुमेरियन नगर ‘बाबिलोन‘ शब्द दरअस्ल ‘बाबेईल‘ था अर्थात ईश्वर का द्वार, हरिद्वार । यही वह शब्द है जो किसी न किसी रूप में इब्रानी, सुरयानी तथा कलदानी भाषाओं में ईश्वर के अस्तित्व के लिए इस्तेमाल होता आया है। जिस वुजूद के लिए यह नाम हमेशा से इस्तेमाल होता आया है वह सबका मालिक है। सबका मालिक एक है। वही एक सबका इलाह (पूज्य और वंदनीय) है।

अधिक जानकारी के लिए देखें:

http://vedquran.blogspot.com/2010/11/allah-in-indian-scriptures-anwer-jamal.html

वेदों में इब्राहीम अलैहिस्सलाम के नगर 'उर' का वर्णन है

वेद का सबसे पहला छंद गायत्री ऋषि विश्वामित्र को ब्रह्मा जी के निर्देशन में साधना करने पर मिला था।

वेद के BARAHAMA जी अर्थात् #ABRAHAM
के शहर 'उर' का नाम वेद में मौजूद है। नाम के अक्षरों में भी समानता है। एक अक्षर A को आगे पीछे करने से एक  नाम के दो नाम बन जाते हैं।
इराक़ के उर नगर में सांप के विष की चिकित्सा करने वाले वैद्य को
उर्गुला
और उर नगर की सुंदर स्त्री को
उर्वशी
कहते थे।
बाद में उर्वशी नाम दूसरे देशों में भी चला गया तो भारत में भी वेद आ गए और इस तरह भारत में उर्वशी नाम भी आ गया।

ब्रह्मा जी वैदिक देवता हैं। ब्रह्मा जी अर्थात् अब्राहम की संतान अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते कश्मीर में आकर आबाद हुई थी। जिन्हें वैदिक लोग देवता कहते थे। इसीलिए कश्मीर को पुराणों में स्वर्ग कहा गया है। अब्राहम के वंशज फ़िलिस्तीन से अपने साथ ज़ैतून लाए थे। वे आज भी कश्मीर में ज़ैतून की खेती करते हैं।
🌿🌿🌿
वे सब देवता आज मुस्लिम हैं।
स्वर्ग में इस्लाम है।
ईरान का अर्थ आर्यों का स्थान है।
ईरान में इस्लाम है।
आज आर्य इस्लाम के रक्षक हैं।
देवता मुस्लिम, आर्य मुस्लिम।
🍇🍇🍇🌿🌿🌿🌿

Friday, September 11, 2020

ओंकार का सही प्राकृतिक उच्चारण क्या है?

वैदिक धर्म में ऊँ का इतना अधिक महत्व है कि हरेक शुभ कार्य में सबसे पहले इसका उच्चारण करते हैं। इसकी महिमा और इसकी शक्ति बताते हुए कहा गया है कि

हां, यह शब्दांश ब्रह्म है,
यह सबसे ऊंचा शब्द है
वह जो इस उच्चारण को जानता है,
वह चाहे जो चाहे, उसका है।
– कठो उपनिषद, 1.2.15-1.2.16
एक आदमी, जो ऊँ का सही उच्चारण जानता है। वह जो चीज़ चाहे, वह चीज़ उसकी है। अब एक आदमी स्वयं चेक करके देख सकता है। वह अपनी ज़रूरत की किसी चीज़ को चाहे और ऊँ का उच्चारण करे। यदि वह चीज़ उसे मिल जाए तो उसका उच्चारण सही है। यदि सबको उनकी इच्छित वस्तु मिल जाया करती तो आज भारत में अभाव का रोना इतने अधिक लोग न रोते। ऊँ का जाप करने वाले अरबों अभावग्रस्त लोग इस तथ्य का प्रमाण हैं कि वे ऊँ का सही उच्चारण नहीं जानते। वैदिक पंडित ऊँ का संस्कृत उच्चारण करते हैं प्राकृतिक नहीं है, जोकि प्रकृति में है। ऋषि प्रकृति में ऊँ की ध्वनि बैल और बादल की ध्वनि में सुनते थे। जिसका वर्णन वेद में आया है।

श्रीमद्भगवद्गीता में ओंकार को एकाक्षर ब्रह्म कहा है। प्राकृतिक उच्चारण वह है जिसमें केवल एक अक्षर का उच्चारण किया जाए जैसे कि बैल और गाय करते हैं। यदि बैल और गाय की तरह ऊँ का उच्चारण किया जाए तो ऊँ का सही प्राकृतिक उच्चारण किया जा सकता है। एक अक्षर को जब तीन अक्षर मानकर उच्चारण किया जाएगा तो वह प्राकृतिक उच्चारण न रहेगा और पूरा फल न देगा।

योग वशिष्ठ के अनुसार ऊँ का सही उच्चारण उस बच्चे के रोने के स्वर के समान है, जो ऊँ, ऊँ करके रोता है।
गाय और बैल जब रंभाते हैं तो 'ओं' 'ओं' शब्द निकालते हैं। जिसे पशुपालक आर्य शुभ और समृद्धि का प्रतीक मानते थे। जिस आर्य के घर के बाहर जितने अधिक गाय बैल होते थे, वह समाज में उतना अधिक समृद्ध और शक्तिशाली होता था। समृद्ध और शक्तिशाली आर्य हर ओर से 'ओं' की ध्वनि सुनते थे। वे स्वयं भी हर शुभ कार्य से पहले 'ओं' शब्द बोलने लगे। बाद में जब आर्यों ने लिपि में लिखना सीखा तो वे 'ओं' शब्द को 'ओम्' और 'ओउम्' लिखने लगे। ओम् का सही उच्चारण वह है, जो गाय और बैल बोलते हैं। बाद में जब वैदिक विद्वान प्रकृति के बजाय अपनी बनाई व्याकरण पर आश्रित होते गए तो अधिकतर पंडित ओम् का उच्चारण गाय और बैल से भिन्न करने लगे जैसा कि आजकल प्रचलित है।

वैदिक विद्वानों ने किसी समय 'ओं' को सृष्टिकर्ता परमेश्वर का नाम और किसी विद्वान ने तो निज नाम तक घोषित कर दिया। जबकि चारों वेदों में रचयिता परमेश्वर का कोई ऐसा नाम नहीं है, जो वेदों में केवल परमेश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ हो और उसे ऋषियों ने किसी अन्य सृष्टि के लिए न बोला हो। अब ओंकार को परमेश्वर का नाम माना जाता है।
गाय बैल 'ओं' बोलते हैं। इससे 'ओं' शब्द का महत्व कम नहीं होता क्योंकि रचयिता परमेश्वर क़ुरआन में कहता है कि बादल, पहाड़, पशु-पक्षी और ज़मीन व आसमान की हर चीज़ रब की तस्बीह (गुणगान) करती है:
1.बादल की गरज उसका गुणगान करती है।
-सूरह अर्-रअद 13
2.“सातों आकाशों और धरती और जो कोई उनके बीच है सब उसकी तस्बीह करते हैं, और कोई चीज़ नहीं जो उसकी प्रशंसा के साथ तस्बीह न करती हो; परन्तु तुम उसकी तस्बीह को समझते नहीं !
-सूरह इसरा 44
3.और हमने दाऊद को अपनी तरफ से बड़ी नेमत दी थी ; (और हमने हुक्म दिया): हे पहाड़ों ! पक्षियों समेत उसके साथ (रुजू की) ‘तस्बीह’ में गुंजित हो !
-सूरह सबा 10
हम पवित्र क़ुरआन के आलोक में गाय बैल के शब्द 'ओं' को समझें तो वह रचयिता परमेश्वर का गुणगान (तस्बीह) है। अत: ऊँ रब की तस्बीह है।

Monday, September 7, 2020

Bhag Jhuthe Bhag: Click Bait Title Exposed

यह पोस्ट एक झूठे दावे की वीडियो के खण्डन में लिखी गई है। सबसे पहले पेश है वह वीडियो:

https://youtu.be/uwJZxjmvAPE


मेरा जवाब:

इंसान को पैदा करने वाले रब ने पवित्र क़ुरआन के रूप में एक ऐसी किताब दी है जिसमें इंसान के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में फ़लाह और कल्याण पाने का क़ानून बयान किया गया है। वह किताब भविष्यवाणियां भी करती है। वह ऐसे बहुत से गुणों से भरपूर है। अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में फ़रमाया है कि पवित्र क़ुरआन जैसी किताब लिखना इंसानों के बस का काम नहीं है।
पैग़म्बर मुहम्मद साहब ने सब लोगों को पवित्र क़ुरआन सुनाया। उनकी बीवियों, बेटियों,  दामादों और नवासों ने पवित्र क़ुरआन को रब का संदेश माना। उसे उनके दोस्तों ने माना। पवित्र क़ुरआन वह किताब है जिसे पैग़म्बर मुहम्मद साहब के दुश्मनों ने भी उनका दोस्त बनकर माना। यहां तक कि जो लोग मुहम्मद साहब से लड़े और पवित्र क़ुरआन का जीवन भर विरोध करते हुए मर गए, वे दुश्मन भी हमेशा मोहम्मद साहब को सच्चा इंसान मानते रहे। उनके दुश्मन भी अपनी दौलत अमानत के रूप में उनके पास उनकी सच्चाई के कारण रखवाते रहे।
पैग़म्बर मुहम्मद साहब की सच्चाई की वजह से ही रब का सच्चा कलाम उनके दिल पर उतरा और उनकी सच्चाई की वजह से ही लोगों ने पवित्र क़ुरआन को माना और उन्होंने अपने माल और अपनी जानों की कुर्बानियां दीं। पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने क़ुरआन को फैलाया। आज क़ुरआन हर देश के क़ानून का हिस्सा है। अमेरिका हो या भारत हो या कोई अन्य देश हो सब देशों ने पवित्र क़ुरआन के कई कानूनों को कल्याणकारी देखकर न्याय और शाँति व्यवस्था के लिए अपने देश का क़ानून बनाया है। आज पूरी दुनिया में इस्लाम को एक अरब 53 करोड़ मुस्लिम मानते हैं और मुस्लिम के अलावा भी अन्य धर्मों के करोड़ों लोग क़ुरआन की शिक्षाओं को अपनी भलाई के लिए मानते हैं। आज सब देशों के लोग पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं को अपने देश के संविधान के रूप में मानते हैं। चाहे लोगों को पता हो या पता न हो लेकिन आज पवित्र क़ुरआन लोगों की रोज़ाना की ज़िंदगी में किसी न किसी रूप में शामिल है। पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं में अपनी भलाई देखकर आज हर देश‌ की हर भाषा में लोग इसे पढ़ रहे हैं। आज हर हर शहर में पवित्र क़ुरआन मौजूद है। दुनिया की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताब पवित्र क़ुरआन है। पवित्र क़ुरआन की यह ख़ासियत है कि इसे लाखों लोगों ने पूरा याद किया है। दूसरी किसी किताब के इतने हाफ़िज़ और कंठस्थी नहीं हैं।
पवित्र क़ुरआन का विरोध करने वाले दुश्मनों ने पवित्र कुरआन जैसी किताब लिखने की कोशिश की लेकिन वे क़ुरआन जैसी किताब न लिख सके। जिस पर वे खुद चले हों या जिस पर उनकी बीवियां, बेटियां, दामाद, ससुर, दोस्त और उनके मानने वाले चले हों। पैग़म्बर मुहम्मद साहब के दुश्मन बहुत बड़े सियासी लीडर थे और वे अपने कबीलों के लिए क़ानून बनाते रहते थे। तब भी वे कोई ऐसी किताब न लिख सके जिसे वे क़ुरआन जैसी किताब बता देते‌। उनकी लिखी किसी किताब को पढ़कर उनके दुश्मन उनके दोस्त नहीं बने।  उनकी लिखी कोई किताब दुनिया के हर देश और हर शहर में आज मौजूद नहीं है जैसे कि पवित्र क़ुरआन मौजूद है। आज पैग़म्बर मुहम्मद साहब के दुश्मनों का नाम केवल इसलिए जाना जाता है कि वे पवित्र क़ुरआन का विरोध करते थे क्योंकि पवित्र क़ुरआन लोगों को चौधरियों की पूजा से, मूर्तिपूजा से रोकता है। पवित्र क़ुरआन सरदार चौधरियों को कमज़ोरों पर ज़ुल्म करने से मना करता है और वह अमीर लोगों के माल में बेघर, अनाथों और ग़रीबों का हक़ ठहराता है। जिसे मक्का के सरदार मानना नहीं चाहते थे। वे दूसरों को अपने बराबर खड़े होने देना नहीं चाहते थे। वे मूर्ति पूजा के चढ़ावे से वंचित होना नहीं चाहते थे। वे कमज़ोरों को दबाकर उनका माल हड़प लेते थे। वे बेघर, अनाथों और ग़रीबों को अपने माल में हिस्सा नहीं देना चाहते थे। वे ज़ालिम सरदार आज अपने साहित्य या अपने रचनात्मक कामों के लिए याद नहीं किए जाते। ऐसे सख़्त दुश्मनों ने भी कभी यह दावा न किया कि उन्होंने पवित्र क़ुरआन जैसी कोई किताब बनाई है।
आज मैंने एक मित्र के कहने पर एक वीडियो देखी। जिसमें एक लौंडा अपनी पहचान छिपाकर यह दावा कर रहा है कि नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधियों ने पवित्र क़ुरआन जैसी किताब उनके सामने ही बना ली थी। यह एक बिल्कुल झूठा दावा है। इसे झूठा साबित करने की ज़रूरत भी नहीं है। बस इतना कह देना काफ़ी है कि
'अच्छा, अगर नबी मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधियों ने पवित्र क़ुरआन जैसी कोई किताब लिखी थी तो लाओ उस किताब को हमें दिखाओ। 
उस किताब के लेखकों का नाम बताओ।
उस किताब की शिक्षाएं और कानून बताओ। वह किताब कमज़ोरों और गरीबों का भला करने के लिए क्या शिक्षा देती है?, उसके बारे में बताओ। उस किताब के लेखक का, उसके परिवार का, उसके दोस्तों का और उस किताब को सच्चा मानने वालों का जीवन दिखाओ ताकि हम देख सकें कि क्या वाक़ई वह किताब पवित्र क़ुरआन की तरह लोगों के दिलों में याद और नक़्श हो जाती है?
क्या वाक़ई वह किताब भी क़ुरआन की तरह लोगों का नज़रिया बदलकर उनका जीवन बदलती है?
क्या वह किताब भी भविष्यवाणी करती है और वह बाद में सच साबित होती है?, जैसे कि अल्लाह ने पवित्र क़ुरआन में नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के द्वारा मक्का फ़तह होने की भविष्यवाणी है और बाद में वह भविष्यवाणी पूरी हुई।
क्या नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधियों के द्वारा भी अपनी किताब में अपने द्वारा मदीना का विजेता बनने की भविष्यवाणी की गई थी जैसा कि वे कहते थे और क्या उस किताब की भविष्यवाणी पवित्र क़ुरआन की भविष्यवाणी की तरह पूरी हुई?'
बस यह सुनते ही झूठे दावेदार भाग खड़े होंगे और वे अपने दिल में ख़ुद से कहेंगे: 'भाग झूठे भाग'
क्योंकि न तो नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधियों ने पवित्र क़ुरआन जैसी किताब लिखी थी और न वे उस किताब को आज दिखा सकते हैं। उनके पास ऐसी कोई किताब नहीं है जिसे वे अपने दावे के सुबूत में दिखा सकें। वे झूठे लोग ख़ुद क़ुरआन जैसी किताब लिखने में नाकाम होने के बाद यह दावा कर रहे हैं कि पवित्र क़ुरआन जैसी किताब नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विरोधियों ने तभी लिख दी थी। अगर लिख दी थी तो पवित्र क़ुरआन आज भी बाक़ी है और वह किताब तभी क्यों मिट गई?
जो किताब ख़ुद को क़ुरआन की तरह बाक़ी न रख सकी तो वह किताब पवित्र क़ुरआन जैसी तो न हुई!
ये झूठे धोखेबाज़ लोग आम भोले शरीफ़ मुस्लिमों के ईमान में ख़लल और फ़साद डालने के लिए बिना सुबूत के सिर्फ़ झूठे दावे करते हैं। वे कहते हैं कि हम इस्लाम छोड़ चुके हैं। जबकि हक़ीक़त में ये दूसरे धर्म के बेरोज़गार लोग हैं, जिनसे दुकान, खेत और कारख़ाने में मेहनत करके पिज़्ज़ा पेप्सी नहीं खाया जाता। सो ये चैनल खोल कर बकर बकर कुछ भी बोल देते हैं और लाईक कमेंट बटोरने के चक्कर में बहुत बदतमीज़ी करते हैं। जिससे इनकी सोच और इनकी गिरावट का पता चलता है।  मैं इनके लिए वैसे शब्द नहीं बोल रहा हूँ जैसे ये अपनी वीडियो में अल्लाह और उसके रसूल के बारे में टीआरपी बढ़ाने के लिए बोलते हैं। 
बहरहाल इनके ज़रिए इस्लाम का नकारात्मक प्रचार होता है। जिससे लोग इस्लाम का ओपिनियन जानने के लिए उत्सुक हो जाते हैं और जब उनके सामने इस्लाम के प्रचारक इस्लाम का कांसेप्ट रखते हैं तो वे इस्लाम क़ुबूल कर लेते हैं। हमें उम्मीद है कि नक़ाब पहनकर इस्लाम को कोसने वाले दूसरे धर्म के ये लौंडे भी एक दिन इस्लाम क़ुबूल कर लेंगे जैसे कि 
आमीन।

Sunday, September 6, 2020

ख़ुदा ने इतने सारे धर्म मत क्यों बनने दिए?

 


मैंने सत्यानंद महाराज सत्य जी की पोस्ट पर जवाब में यह कमेंट किया:

ख़ुदा ठोस नहीं है तो उसके बारे में कोई जवाब ठोस कैसे हो सकता है?
क्या कभी आपने पूूूरी मानव जाति को #अल्बोनियम मैटल के बारे में  सोचते हुए सुना है?
नहीं!
क्यों?
क्योंकि अल्बोनियम मैटल का कोई वुजूद नहीं है। पूरी मानव जाति किसी ऐसी चीज़ के बारे में नहीं सोच सकती जिसका वुजूद न हो।

दो चार लोग ज़रूर ऐसी चीज़ के बारे में सोच सकते हैं, जो न हो लेकिन पूरी धरती के अरबों आस्तिक और नास्तिक सब ख़ुदा परमेश्वर के बारे में सोचते हैं तो यह सोच ख़ुदा के होने का सुबूत है।
जितने लोगों ने ख़ुुुदा परमेश्वर के बारे में सोचा, उनकी सोच को जब लोगों ने लिखा तो उतने ही धर्म मत बन गए।
उन सबमें से एक दीन ख़ुदा का भेजा हुआ है।
वह दीन कौन सा है?
यह तय करना इंसान का काम है।
रब को इंसान की अक़्ल का इम्तेहान लेना है कि कौन सा इंसान सही दीन तक पहुंचता है।
इसीलिए उसने इतने सारे धर्म और दीन बनने दिए हैं।

जल छलका एक से दूजे में जाकर बना इंसान

जो न विचारे ख़ुद को कैसे पहचानेगा भगवान

-डा० अनवर जमाल

Tuesday, August 11, 2020

हाथ से कमाने के कुछ आसान तरीक़े

मेरी तब्लीग़ में दीन की तालीम, रोज़गार की तालीम, कम्पैरेटिव स्टडी और अल्लाह की निशानियों में ग़ौर करना एक साथ चलता है। मिसाल के तौर पर आप मेरा यह लेख देखें:

बेहतरीन कमाई हाथ की कमाई है

بہترین کسب معاش ہاتھ کی کمائی ہے

ہاتھ کی کمائی رزق حلال حاصل کرنے کا سب سے اعلیٰ اور بلند ذریعہ ہے اور اس کے متعلق نبی اکرم ﷺ نے بہت تاکید فرمائی ہے۔ حضرت مقدام بن معدی کربؓ سے روایت ہے کہ رسول اﷲ ﷺ نے فرمایا : ’’ کسی نے اس سے بہتر کھانا نہیں کھایا جو اپنے ہاتھ کی کمائی سے کھائے اور بے شک اﷲ کے نبی حضرت داؤدؑ اپنے ہاتھوں کی کمائی کھایا کرتے تھے۔‘‘ (بخاری )


حضرت رافع بن خدیجؓ کا بیان ہے کہ آپؐ سے دریافت کیا گیا، یا رسول اﷲ ! (ﷺ) کون سا ذریعۂ معاش پاکیزہ ہے ؟ آپؐ نے فرما یا: آدمی کا اپنے ہاتھ سے کمانا 

اور ہر جائز تجارت۔‘‘ (مسند احمد)

इन हदीसों में अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जायज़ तरीक़े से जिस्मानी मेहनत करके अपने 'हाथ से' कमाकर खाने की फ़ज़ीलत बताई है। जिसमें, तिजारत, दस्तकारी, खेती और मज़दूरी सब काम आ गए हैं।

एक्यूप्रेशर की #reflexolology और #sujoke सीखकर भी आप हाथ से कमा सकते हैं और इस तरीक़े में मरीज़ के हाथ पर प्रेशर देकर मर्ज़ को कम किया जाता है। मेरा ज़ाती तजुर्बा है कि यह बहुत इफ़ेक्टिव है, ख़ासकर नस के दर्द में, सिर दर्द में, दिल के दर्द या अटैक में और पेट रोगों में। मैंने इससे पोलियो के पुराने मरीज़ ठीक होते हुए देखें हैं लेकिन पोलियो के मरीज़ को एक साल एक्यूप्रेशर कराना पड़ता है।

जो नौजवान छोटी तिजारत करने में शर्म महसूस करते हैं और बड़ी तिजारत करने के लिए रूपया और साधन नहीं हैं और दूसरों के मातहत काम करने का मिज़ाज नहीं है। ऐसे लोग यू ट्यूब और व्हाट्स एप पर एक्यूप्रेशर का कोर्स कर लें। कुछ हफ़्ते अपने शहर के किसी एक्सपर्ट के साथ रहकर अमली तजुर्बा हासिल कर लें।

इन् शा अल्लाह, तीन माह में आप कमाने के लायक़ हो जाएंगे।

मैं यहाँ 'हाथ' की अहमियत समझाने के लिए यह भी बता दूं कि हिब्रू भाषा में परमेश्वर ने अपना नाम 'यहुवा' बताया था। जिसका पहला अक्षर 'यद' है और हिब्रू और अरबी में यद का अर्थ 'हाथ' होता है। 

अगर आप ध्यान दें तो आपको अपने हाथ में 'अल्लाह' नाम दिख सकता है।

जब आप अपने हाथ से कमाते हैं, हक़ीक़त में तब आप रब के नाम से कमाते हैं। जब आप ऐसा मानकर कमाएंगे तो आपकी कमाई में बरकत होगी क्योंकि

'बड़ी बरकत वाला है तुम्हारे रब का नाम जो अज़मत और बुज़ुर्गी वाला' -पवित्र क़ुर'आन 55:78

अगर आप एक औरत हैं तो आप भी यह कला सीखकर कमा सकती हैं।

जो औरतें एक्यूप्रेशर नहीं सीख सकतीं, वे अपने घर से हाथ की सजावट का सामान मेंहदी और चूड़ी बेचकर कमा सकती हैं।

मैंने इस पोस्ट में हाथ से हाथ पर काम करके कमाने की जानकारी दी है क्योंकि

मेरा मिशन है रब के नाम से #Mauj_Ley



Sunday, August 9, 2020

सृ‌ष्टा राम और सृष्टि राम को पहचानिए, एक क्रिएटर गॉड और दूसरा महापुरुष है।

5 अगस्त 2020 को मैंने अपने दिल को चैक किया कि क्या मुझे अब भी राम नाम से प्यार है?

मैंने देखा कि वह राम नाम से प्रेम पहले की तरह ज्यों का त्यों है क्योंकि वह प्रेम राजनीति से प्रेरित नहीं है बल्कि ज्ञान पर आधारित है।

मैंने बहुत पहले अपने एक व्हाट्स एप ग्रुप में एक पोस्ट ख़ुद लिखकर शेयर की थी, जिसमें सब मुस्लिम थे और उसे सबने सराहा था। मैंने सोचा कि मैं आज उस पोस्ट को यहां अपने सब धर्म के पाठकों के सामने पेश करूँ ताकि एक रहस्य जिसे कम लोग जानते हैं, आज उसे ज़्यादा लोग जान लें।

*राम और राम की पहचान*

*बनाएगी मेरा भारत महान*

Dr. Anwer Jamal

💚🌹💚

मैंने अपने बड़ों को देखा है कि वे सृष्टा राम और दशरथ पुत्र राम को ख़ूब पहचानते हैं, जबकि सनातनी ही इनके अंतर को भूलकर इन्हें गडमड कर देते हैं। इस गडमड करने से ही आम मुस्लिम और आलिम कन्फ़्यूज़्ड हैं।

ख़ुद मुझे राम के विषय में यह जानने में 30 साल से ज़्यादा लग गए कि सनातनी हिन्दू एक से ज़्यादा पर्सनैलिटीज़ के लिए राम नाम बोलते हैं।

वे परमेश्वर को भी राम कहते हैं और एक महान राजा को भी राम कहते हैं, जो मनुष्य की तरह खाते पीते थे, जिनके पत्नी और बच्चे थे, जो पैदा हुए और फिर एक ब्राह्मण दुर्वासा के कारण उन्हें सरयू में समाकर अपने जीवन का अंत करना पड़ा। इसके अलावा भी दो राम और हैं। 

एक राम दशरथ घर डोले, एक राम घट घट में बोले

एक राम का सकल पसारा, एक राम दुनिया से न्यारा

सनातन परंपरा में चार अस्तित्व के लिए राम शब्द आया है। और कमाल की बात यह है कि 'जय श्री राम' का नारा लगाने वालों ने या श्री रामचंद्र जी में श्रद्धा रखने वालों ने मुझे या दूसरे मुसलमानों को यह रहस्य समझाने के लिए कोई पुस्तक या ऑडियो वीडियो भेंट नहीं की। इसमें से ज़्यादातर ज्ञान मुझे मौलाना साहिबान और सूफ़ियों ने और मुस्लिम स्कॉलर्स ने दिया है। कुछ ज्ञान मैंने अपने शौक़ से खुद शोध करके पता लगाया है।

मैं यह अंतर और रहस्य जानने के बाद समझ चुका हूँ कि हर मस्जिद राम मंदिर है और मैं एक रामभक्त हूँ।

इसके बावुजूद मैं ख़ुद सनातनियों से यह नहीं कहता कि मैं रामभक्त हूँ क्योंकि मैं कहूंगा सृष्टा राम के विषय में और वे समझेंगे सृष्टि राम के विषय में।

मेरा प्रेमपूर्ण सुझाव यह है कि मंदिर निमार्ण में अरबों रूपये लगाने के साथ कुछ लाख रूपये का लिट्रेचर राम नाम के पूरे परिचय और विवेचन के साथ प्रकाशित किया जाए और सृष्टा राम और सृष्टि राम का अंतर भी रेखांकित कर दिया जाए कि एक ने पैदा किया है और दूसरा पैदा हुआ है।

हिन्दू धर्म के प्रचारक चैनलों पर यह बात आम कर दी जाए कि सृष्टा राम प्रार्थना स्वीकार करता है और दशरथ पुत्र राम नित्य प्रार्थना करता था।

इससे भ्रम दूर हो जाएगा और हरेक मुस्लिम समझ लेगा कि सनातनी एक नाम 'राम' दोनों के लिए बोल रहे हैं।

फिर मुस्लिम यह समझ लेंगे कि एक राम क्रिएटर गॉड है और दूसरा एक महापुरुष और मर्यादा पुरुषोत्तम है।

क्रिएटर गॉड को मुस्लिम अल्लाह कहते हैं और उसी की वंदना करते हैं और उसी से प्रार्थना करते हैं, उसी के सामने झुकते हैं। इस तरह मुस्लिम समझ लेंगे कि जिसे हिंदू राम कहते हैं उसी को हम अल्लाह कहते हैं। और हम उसी क्रिएटर गॉड अल्लाह की वंदना उपासना और भक्ति करते हैं। जब यह भ्रम दूर हो जाएगा, तब मुस्लिम राम शब्द भी क्रिएटर के लिए आसानी से ऐसे ही बोल देगा जैसे कि वह ईरान की फ़ारसी भाषा का शब्द ख़ुदा बोलता है। जैसे वह अपने लिए ख़ुदा का बंदा बोलता है, वैसे ही वह तब ख़ुद को रामभक्त बोल सकेगा।

दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम सृष्टि राम जी के गुणों की तारीफ़ अल्लामा इक़बाल ने अपनी कविता 'राम' में बहुत सुंदर शब्दों में की है। उसे भी मुस्लिम पढ़ते और रामचंद्र जी को एक महापुरुष के तौर पर आदर देते हैं। इन बातों से सनातनी लोग ही ग़ाफ़िल और अज्ञ हैं। आप इंटरनेट पर 'Ram by Allama Iqbal' लिखकर गूगल सर्च करके पढ़ सकते हैं।

अब जो चाहे सृष्टा राम की भक्ति कर ले और जो चाहे सृष्टि राम की भक्ति कर ले। भारतीय संविधान और वेद पुराण इसकी पूरी इजाज़त देते हैं कि हर एक जैसे चाहे वैसे अपने उपास्य राम की भक्ति कर ले।

सारा झगड़ा अज्ञान का है।

अज्ञान के कारण ही सनातनी तनातनी कर रहे हैं।

जब वे ज्ञान के आलोक में देखेंगे तो उन्हें स्पष्ट ज्ञात हो जाएगा कि जगत का सृष्टा राम, दशरथ पुत्र श्री राम से बड़ा है और मुस्लिम बड़े राम की भक्ति करने के कारण सनातनियों से ज़्यादा बड़े रामभक्त हैं।

मुस्लिम आम और खास लोगों के बारे में आप कोई राय बनाने से पहले अपने पूर्वाग्रह और द्वेष को दूर कर लें। मैं आपको बता दूं कि ख़ुद राम भक्ति का दावा करने वाले सनातनियों को नहीं पता कि राम तारक मंत्र क्या होता है?

इसका परीक्षण करने के लिए आप रेंडमली 'जय श्री राम' बोलने वाले 10 लोगों को चुनें और उनसे पूछें कि कृपया आप मुझे राम तारक मंत्र सुना दें जो कष्टों को दूर करता है और 10 के 10 लोग आपको राम तारक मंत्र नहीं सुना सकेंगे। यही कारण है कि मुझे किसी रामभक्त ने आज तक राम तारक मंत्र का ज्ञान नहीं दिया। मुझे राम तारक मंत्र का ज्ञान अपने गुरु जी आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहिब रहमतुल्लाहि अलैह ने दिया।

'राम रामाय नमः'

अर्थात् राम के राम के लिए नमन है।

इसमें स्पष्ट रूप से दो राम का वर्णन है।

क्या बड़े और सृष्टा राम की भक्ति करना रामभक्ति करना नहीं है, जो जगत को समस्त कष्टों से तारता है?

आप को राम भक्ति सीखनी है तो ऐसे मुस्लिम विद्वानों से मिलें, जिन्होंने पवित्र क़ुरआन के साथ वेद पुराण भी पढ़ा हो। वे आपको वास्तविक राम भक्ति सिखाएंगे। 

Note: मेरी पोस्ट से तंग नज़र लोग दूर रहें और पाठक आपस में ऐतराज़ का जवाब न दें। यह काम मेरा है और मैं ऐतराज़ का जवाब न दूं तो यह मेरा चुनाव है क्योंकि जिस बहस से कुछ हासिल न हो, उसे न करना बेहतर है।

सन्तोष पाण्डेय: अनवर साहब जहां तक मंत्र दान का प्रश्न है तो मैं इसका समर्थन नहीं करता (चूंकि मैं खुद ब्राह्मण हूं तो मुझे इससे नुक़्सान कम या कुछ नहीं लेकिन लाभ की सम्भावना अधिक है) मंत्रदान में कुलगुरू अपना और याचक का सर धोती से ढक देते हैं उधर पुरोहित जी शंख फूंकते हैं उसी बीच कान में तीन बार गुरूजी मंत्र बोलते और हिदायत देते हैं कि यह मंत्र किसी को बताना नहीं है सुबह शाम इसका जाप करना है (याद रहे सुबह शाम जाप करना है किसी मंदिर मस्जिद या मूर्ति के सामने नहीं स्वस्थान पर) लेकिन मुझे आज तक ये समझ में नहीं आया जो कल्याणकारी है उसमे इतनी गोपनीयता क्यों? उसे तो सार्वजनिक होना चाहिए सबका भला हो।

अब दूसरी बात राम तारक मंत्र की तो अधिकतर लोग शैव मंत्र ग्रहण करते हैं आधुनिक समय में क्योंकि राम तारक मंत्र में मांसाहार निषेध है (मान्यता अनुसार) और घर के बुजुर्गों का मानना होता है कि आजकल के बच्चे हैं कही मांस खा लिया तो पाप का भागी होगा इसलिए शैव मंत्र ही अपनाने पर ज़ोर देते हैं

रामायण में एक प्रसंग है जब समुद्र पार कर लंका जाने का समय हुआ तो समस्या आई तो राम सेना में दो लोग थे, नल नील, जिन्हें श्राप था वे जो कुछ भी पानी में फेंकेंगे वह तैरने लगेगा तो वे पथ्थरों पर राम राम लिखते और समुद्र में फेंक देते इस तरह पुल का निर्माण होने लगा एक पथ्थर भगवान राम ने भी फेंका वह डूब गया तो उन्होंने पूछा मेरा नाम लिखकर पत्थर डालने से नहीं डूबता लेकिन जब मैं स्वयं पत्थर डाल रहा हूं तो वह क्यों नहीं तैरता तब जामवन्त ने जबाब दिया प्रभु शक्ति आपमें नहीं आपके नाममें है, यह एक प्रसंग है आप समझदार हैं बेहतर समझ सकते हैं मैं इससे आगे जाउंगा तो तत्काल विधर्मी घोषित किया जाऊंगा।

हमारे यहां तो जेल में बंद रामपाल को भी ईश्वर का अवतार नास्त्रेदमस का सायरन न जाने क्या क्या घोषित करके मोटी मोटी किताबें बांटी जा रही हैं

फिर वो तो राम हैं ,विष्णु के अवतार लेकिन कहीं किसी ग्रंथ में ब्रम्हा विष्णु महेश को ईश्वर नहीं बताया गया उन्हे देवता देवाधिपति या महादेव ही कहा गया है यानि उनका भी कोई संचालक है जो सर्वोच्च है वही ईश्वर(अल्लाह) है।

Dr. Anwer Jamal का जवाब यानी मेरा जवाब: सन्तोष पाण्डेय भाई, मन्त्र का एक पहलू तो उसका भाव और अर्थ है कि जो उसे समझ ले तो उसका मन तर जाए दुविधा के सागर से और उसका मन अपेक्षाकृत स्थिर हो जाए। इसके लिए उपदेश में जन समूह को मंत्र सुनाए जाते हैं। जिन्हें कोई भी सुन सकता है और लाभ उठा सकता है।

मंत्र का दूसरा पहलू शक्ति का है जो साधना और अभ्यास से आती है। एक ही शब्द की जब बार बार आवृत्ति की जाती है तो सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा की तरंगें पैदा होती हैं और वे साधक के मन, शरीर और जीवन पर ही नहीं बल्कि उससे जुड़े लोगों फर, देश, दुनिया और ब्रह्मांड पर थोड़ा या ज़्यादा असर डालती हैं, जिसे साधक ख़ुद नहीं समझ सकता। कई बार साधक अपने होश खो देता है और परमहंस या मजज़ूब बन जाता है। अगर गुरू में शक्ति नहीं होती तो वह लंबे समय के लिए या हमेशा के लिए भी वैसा ही रह जाता है और अगर गुरू में मानसिक (रूहानी) शक्ति होती है तौ वह उसका उचित उपाय करके उसे नार्मल कर देता है। शक्ति और साधना को हमेशा गुप्त रखा जाता है ताकि लोग उस पर विपरीत विचार देकर साधक के मन में शंका न उत्पन्न कर दें।

सनातनी दशरथ पुत्र श्री राम को साकार परमेश्वर मानते हैं तो यह उनका अपना 'दर्शन' है परंतु दशरथ ने ऐसा नहीं कहा और न श्रृंगी ऋषि ने ऐसा कहा है, जिनके आशीर्वाद से श्री राम पैदा हुए और न श्री राम ने ऐसा कहा और न दुर्वासा ऋषि ने श्री राम को कभी परमेश्वर माना और न कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने उनके जीवन काल में उन्हें परमेश्वर माना बल्कि जब श्री राम ने कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से रावण वध के बाद शाप मुक्ति यज्ञ करने को कहा तो उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया था।

बाद में लोग जोश में आकर किसी के बारे में जो भी मानने लगें वह उनकी मान्यता है। बाल्मीकि रामायण में रामचंद्र जी के हाथ का पत्थर डूब जाने और छाया सीता की कथा नहीं है। बाद में लोग कुछ भी लिखते रहे हैं।

जैसे कि मोदी ने कभी नहीं कहा कि मैं परमेश्वर का अवतार हूँ लेकिन कुछ लोग जोश में ऐसा कह रहे हैं।

बाल्मीकि रामायण में शिकार और मांसाहार के कई प्रसंग हैं।

जब भरत जी सेना सहित भारद्वाज ऋषि के आश्रम में जाते हैं, तब भारद्वाज क्या खिलाते हैं?

आप पढ़ सकते हैं।

कश्मीरी, गढ़वाली, बंगाली, उड़िया और नेपाली ब्राह्मण माँस खाते हैं तो क्या वे  सब शैव मंत्र पढ़ते हैं?

यह सब गुरूओं की बाद की व्यवस्था है जो हर प्रान्त में अलग है बल्कि हरिद्वार के हर अखाड़े के विचार मंत्र और भोजन के विषय में अलग हैं।

भोजन का चयन मंत्र की प्रकृति को ध्यान में रखकर किया जाता है कि यह उग्र है या सौम्य?

गर्म मिज़ाज के मंत्र पढ़ो और घी दूध न खाओ तो अंदर से ख़ून रिसकर पाख़ाने पेशाब के साथ आने लगता है।

ऐसे ही कई बार गोश्त वग़ैरह से रोका जाता है तो उसकी कुछ वजह होती है।

एक वजह यौनेच्छा को कम करना भी होती है ताकि इसका ध्यान विपरीत लिंग की तरफ़ न जाए और एकाग्र चित्त होकर अपना अभ्यास करता रहे।

भारत में जिन इलाकों में बौद्ध जैन विचारधारा का प्रभाव बढ़ गया था। वहां वहां ब्राह्मणों ने यज्ञ बंद किए और माँसाहार को त्यागकर जनता का समर्थन जुटाया और फिर बौद्ध जैन विचारधारा का प्रभाव कम किया और अपना राजनैतिक क़ब्ज़ा वापस लिया।

राजनैतिक वर्चस्व को वापस पाने के चक्कर में कुछ इलाकों के ब्राह्मणों का भोजन बदल गया जबकि बाक़ी इलाक़ो में लोग वैदिक काल की तरह पूर्ववत मांसाहार करते रहे।

जो शक्तिशाली लोग या इंद्र आदि राजा हुए हैं या अश्विनी कुमार आदि वैद्य हुए हैं, उन्हें देवता कहा जाता है। अग्नि और सूर्य आदि प्राकृतिक चीज़ों को भी देवता कहा गया है। जो जनता को देता है, वैदिक जन उसे देवता कहते हैं। देवताओं का आदि और अंत है। परमेश्वर अनंत है। उसी अनंत परमेश्वर को मुस्लिम अल्लाह कहते हैं।

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